भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 354

मूर्ति समझना चाहिये ॥ ३९ ॥ सर्वान् स्विष्टकृतो देवान् विद्याद् य इह कश्चन । न समानो ब्राह्मणस्य तस्मिन् प्रयतेत स्वयम् ॥ ४० ॥ यदि कोई इस लोकमें अभीष्ट सिद्ध करनेवाले सम्पूर्ण देवताओंको जान ले, तो भी वह ब्रह्मवेत्ताके समान नहीं होता; क्योंकि वह तो अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये ही प्रयत्न कर रहा है ॥ ४० ॥ यमप्रयतमानं तु मानयन्ति स मानितः । न मान्यमानो मन्येत न मान्यमभिसंज्वरेत् ॥ ४१ ॥ जो दूसरोंसे सम्मान पाकर भी अभिमान न करे और सम्माननीय पुरुषको देखकर जले नहीं तथा प्रयत्न न करनेपर भी विद्वान्‌लोग जिसे आदर दें, वही वास्तवमें सम्मानित है ॥ ४१ ॥ लोकः स्वभाववृत्तिर्हि निमेषोन्मेषवत् सदा । विद्वांसो मानयन्तीह इति मन्येत मानितः ॥ ४२ ॥ जगत्‌में जब विद्वान् पुरुष आदर दें, तब सम्मानित व्यक्तिको ऐसा मानना चाहिये कि आँखोंको खोलने-मीचनेके समान अच्छे लोगोंकी यह स्वाभाविक वृत्ति है, जो आदर देते हैं ॥ ४२ ॥ अधर्मनिपुणा मूढा लोके मायाविशारदाः । न मान्यं मानयिष्यन्ति मान्यानामवमानिनः ॥ ४३ ॥ किंतु इस संसारमें जो अधर्ममें निपुण, छल-कपटमें चतुर और माननीय पुरुषोंका अपमान करनेवाले मूढ़ मनुष्य हैं, वे आदरणीय व्यक्तियोंका भी आदर नहीं करते ॥ ४३ ॥ न वै मानं च मौनं च सहितौ वसतः सदा । अयं हि लोको मानस्य असौ मौनस्य तद् विदुः ॥ ४४ ॥ यह निश्चित है कि मान और मौन सदा एक साथ नहीं रहते; क्योंकि मानसे इस लोकमें सुख मिलता है और मौनसे परलोकमें। ज्ञानीजन इस बातको जानते हैं ॥ ४४ ॥ श्रीः सुखस्येह संवासः सा चापि परिपन्थिनी । ब्राह्मी सुदुर्लभा श्रीर्हि प्रज्ञाहीनेन क्षत्रिय ॥ ४५ ॥ राजन्! लोकमें ऐश्वर्यरूपा लक्ष्मी सुखका घर मानी गयी है, पर वह भी (कल्याणमार्गमें) लुटेरोंकी भाँति विघ्न डालनेवाली है; किंतु ब्रह्मज्ञानमयी लक्ष्मी प्रज्ञाहीन मनुष्यके लिये सर्वथा दुर्लभ है ॥ ४५ ॥ द्वाराणि तस्येह वदन्ति सन्तो बहुप्रकाराणि दुराधराणि । सत्यार्जवे ह्रीर्दमशौचविद्या यथा न मोहप्रतिबोधनानि ॥ ४६ ॥