महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 372, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह शिष्य सत्पुरुषोंके अनेक गुणोंसे युक्त आचारको प्राप्त होता है। गुरुपुत्रके प्रति भी उसकी यही भावना रहनी चाहिये ॥ १८ ॥ एवं वसन् सर्वतो वर्धतीह बहून् पुत्राँल्लभते च प्रतिष्ठाम् । वर्षन्ति चास्मै प्रदिशो दिशश्च वसन्त्यस्मिन् ब्रह्मचर्ये जनाश्च ॥ १९ ॥ ऐसी वृत्तिसे गुरुगृहमें रहनेवाले शिष्यकी इस संसारमें सब प्रकारसे उन्नति होती है। वह (गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके) बहुत-से पुत्र और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। सम्पूर्ण दिशा-विदिशाएँ उसके लिये सुखकी वर्षा करती हैं तथा उसके निकट बहुत-से दूसरे लोग ब्रह्मचर्यपालनके लिये निवास करते हैं ॥ १९ ॥ एतेन ब्रह्मचर्येण देवा देवत्वमाप्नुवन् । ऋषयश्च महाभागा ब्रह्मलोकं मनीषिणः ॥ २० ॥ इस ब्रह्मचर्यके पालनसे ही देवताओंने देवत्व प्राप्त किया और महान् सौभाग्यशाली मनीषी ऋषियोंने ब्रह्मलोकको प्राप्त किया ॥ २० ॥ गन्धर्वाणामनेनैव रूपमप्सरसामभूत् । एतेन ब्रह्मचर्येण सूर्योऽप्यह्नाय जायते ॥ २१ ॥ इसीके प्रभावसे गन्धर्वों और अप्सराओंको दिव्य रूप प्राप्त हुआ। इस ब्रह्मचर्यके ही प्रतापसे सूर्यदेव समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ होते हैं ॥ आकाङ्क्ष्यार्थस्य संयोगाद् रसभेदार्थिनामिव । एवं ह्येते समाज्ञाय तादृग्भावं गता इमे ॥ २२ ॥ रसभेदरूप चिन्तामणिसे याचना करनेवालोंको जैसे उनके अभीष्ट अर्थकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य भी मनोवांछित वस्तु प्रदान करनेवाला है। ऐसा समझकर ये ऋषि-देवता आदि ब्रह्मचर्यके पालनसे वैसे भावको प्राप्त हुए ॥ २२ ॥ य आश्रयेत् पावयेच्चापि राजन् सर्वं शरीरं तपसा तप्यमानः । एतेन वै बाल्यमभ्येति विद्वान् मृत्युं तथा स जयत्यन्तकाले ॥ २३ ॥ राजन्! जो इस ब्रह्मचर्यका आश्रय लेता है, वह ब्रह्मचारी यम-नियमादि तपका आचरण करता हुआ अपने सम्पूर्ण शरीरको भी पवित्र बना लेता है तथा इससे विद्वान् पुरुष निश्चय ही अबोध बालककी भाँति राग-द्वेषसे शून्य हो जाता है और अन्त समयमें वह मृत्युको भी जीत लेता है ॥ २३ ॥ अन्तवतः क्षत्रिय ते जयन्ति लोकान् जनाः कर्मणा निर्मलेन ।