महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 377, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रिये हृष्यन्त्यप्रिये च व्यथन्ते । स्यादात्मनः सुचिरं याचते यो ददात्ययाच्यमपि देयं खलु स्यात् । इष्टान् पुत्रान् विभवान् स्वांश्चदारा- नभ्यर्थितश्चार्हति शुद्धभावः ॥ १२ ॥ सौहार्द (मित्रता)-के छः गुण हैं, जो अवश्य ही जाननेयोग्य हैं। सुहृद्का प्रिय होनेपर हर्षित होना और अप्रिय होनेपर कष्टका अनुभव करना—ये दो गुण हैं। तीसरा गुण यह है कि अपना जो कुछ चिरसंचित धन है, उसे मित्रके माँगनेपर दे डाले। मित्रके लिये अयाच्य वस्तु भी अवश्य देनेयोग्य हो जाती है और तो क्या, सुहृद्के माँगनेपर वह शुद्धभावसे अपने प्रिय पुत्र, वैभव तथा पत्नीको भी उसके हितके लिये निछावर कर देता है ॥ १२ ॥
त्यक्तद्रव्यः संवसेन्नेह कामाद् भुङ्क्ते कर्म स्वाशिषं बाधते च ॥ १३ ॥ मित्रको धन देकर उसके यहाँ प्रत्युपकार पानेकी कामनासे निवास न करे—यह चौथा गुण है। अपने परिश्रमसे उपार्जित धनका उपभोग करे (मित्रकी कमाईपर अव-लम्बित न रहे)—यह पाँचवाँ गुण है तथा मित्रकी भलाईके लिये अपने भलेकी परवा न करे—यह छठा गुण है ॥ १३ ॥
द्रव्यवान् गुणवानेवं त्यागी भवति सात्त्विकः । पञ्च भूतानि पञ्चभ्यो निवर्तयति तादृशः ॥ १४ ॥ जो धनी गृहस्थ इस प्रकार गुणवान्, त्यागी और सात्त्विक होता है, वह अपनी पाँचों इन्द्रियोंसे पाँचों विषयोंको हटा देता है ॥ १४ ॥
एतत् समृद्धमप्यूर्ध्वं तपो भवति केवलम् । सत्त्वात् प्रच्यवमानानां संकल्पेन समाहितम् ॥ १५ ॥ जो (वैराग्यकी कमीके कारण) सत्त्वसे भ्रष्ट हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंके दिव्य लोकोंकी प्राप्तिके संकल्पसे संचित किया हुआ यह इन्द्रियनिग्रहरूप तप समृद्ध होनेपर भी केवल ऊर्ध्वलोकोंकी प्राप्तिका कारण होता है [मुक्तिका नहीं] ॥ १५ ॥
यतो यज्ञाः प्रवर्धन्ते सत्यस्यैवावरोधनात् । मनसान्यस्य भवति वाचान्यस्याथ कर्मणा ॥ १६ ॥ क्योंकि सत्यस्वरूप ब्रह्मका बोध न होनेसे ही इन सकाम यज्ञोंकी वृद्धि होती है। किसीका यज्ञ मनसे, किसीका वाणीसे और किसीका क्रियाके द्वारा सम्पन्न होता है ॥ १६ ॥
संकल्पसिद्धं पुरुषमसंकल्पोऽधितिष्ठति । ब्राह्मणस्य विशेषण किञ्चान्यदपि मे शृणु ॥ १७ ॥