भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 38

कथं प्रणिपतेच्चायमिह कृत्वा पणं परम् ॥ ८ ॥ यदि भाइयोंसहित कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर अपने घरपर जूआ खेलते होते और ये कौरव वहाँ जाकर उन्हें हरा देते, तो यह उनकी धर्मपूर्वक विजय कही जा सकती थी। परंतु उन्होंने सदा क्षत्रियधर्ममें तत्पर रहनेवाले राजा युधिष्ठिरको बुलाकर छल और कपटसे उन्हें पराजित किया है। क्या यही उनका परम कल्याणमय कर्म कहा जा सकता है? ये राजा युधिष्ठिर अपनी वनवासविषयक प्रतिज्ञा तो पूर्ण ही कर चुके हैं, अब किस लिये उनके आगे मस्तक झुकायें—क्यों प्रणाम अथवा विनय करें? ।। ७-८ ।। वनवासाद् विमुक्तस्तु प्राप्तः पैतामहं पदम् । यद्ययं पापवित्तानि कामयेत युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ एवमप्ययमत्यन्तं परान् नार्हति याचितुम् । वनवासके बन्धनसे मुक्त होकर अब ये अपने बाप-दादोंके राज्यको पानेके न्यायतः अधिकारी हो गये हैं। यदि युधिष्ठिर अन्यायसे भी अपना धन, अपना राज्य लेनेकी इच्छा करें, तो भी अत्यन्त दीन बनकर शत्रुओंके सामने हाथ फैलाने या भीख माँगनेके योग्य नहीं हैं ।। कथं च धर्मयुक्तास्ते न च राज्यं जिहीर्षवः ॥ १० ॥ निवृत्तवासान् कौन्तेयान् य आहुर्र्विदिता इति । कुन्तीके पुत्र वनवासकी अवधि पूरी करके जब लौटे हैं, तब कौरव यह कहने लगे हैं कि हमने तो इन्हें समय पूर्ण होनेसे पहले ही पहचान लिया है। ऐसी दशामें यह कैसे कहा जाय कि कौरव धर्ममें तत्पर हैं और पाण्डवोंके राज्यका अपहरण नहीं करना चाहते हैं ।। १० १/२ ।। अनुनीता हि भीष्मेण द्रोणेन विदुरेण च ॥ ११ ॥ न व्यवस्यन्ति पाण्डूनां प्रदातुं पैतृकं वसु । वे भीष्म, द्रोण और विदुरके बहुत अनुनय-विनय करनेपर भी पाण्डवोंको उनका पैतृक धन वापस देनेका निश्चय अथवा प्रयास नहीं कर रहे हैं ।। ११ १/२ ।। अहं तु ताञ्छितैर्बाणैरनुनीय रणे बलात् ॥ १२ ॥ पादयोः पातयिष्यामि कौन्तेयस्य महात्मनः । मैं तो रणभूमिमें पैने बाणोंसे उन्हें बलपूर्वक मनाकर महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरा दूँगा ।। अथ ते न व्यवस्यन्ति प्रणिपाताय धीमतः ॥ १३ ॥ गमिष्यन्ति सहामात्या यमस्य सदनं प्रति । यदि वे परम बुद्धिमान् युधिष्ठिरके चरणोंमें गिरनेका निश्चय नहीं करेंगे, तो अपने मन्त्रियोंसहित उन्हें यमलोककी यात्रा करनी पड़ेगी ।। १३ १/२ ।। न हि ते युयुधानस्य संरब्धस्य युयुत्सतः ॥ १४ ॥

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