भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 380

दिशः शुक्रो भुवनं बिभर्ति । तस्माद् दिशः सरितश्च स्रवन्ति तस्मात् समुद्रा विहिता महान्तः । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ४ ॥ उक्त दोनों देवताओंको, पृथिवी और आकाशको, सम्पूर्ण दिशाओंको तथा समस्त लोकसमुदायको वह शुद्ध ब्रह्म ही धारण करता है। उसी परब्रह्मसे दिशाएँ प्रकट हुई हैं, उसीसे सरिताएँ प्रवाहित होती हैं तथा उसीसे बड़े-बड़े समुद्र प्रकट हुए हैं। उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं॥ ४ ॥

चक्रे रथस्य तिष्ठन्तोऽध्रुवस्याव्ययकर्मणः । केतुमन्तं वहन्त्यश्वास्तं दिव्यमजरं दिवि । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ५ ॥ जो इन्द्रिय, मन और बुद्धि आदिका संघात—शरीर विनाशशील है, जिसके कर्म अपने-आप नष्ट होनेवाले नहीं हैं, ऐसे इस शरीररूप रथके चक्रकी भाँति इसे घुमानेवाले कर्मसंस्कारसे युक्त मनमें जुते हुए इन्द्रियरूप घोड़े उस हृदयाकाशमें स्थित ज्ञानस्वरूप दिव्य अविनाशी जीवात्माको जिस सनातन परमेश्वरके निकट ले जाते हैं, उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं³॥ ५ ॥

न सादृश्ये तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चिदेनम् । मनीषयाथो मनसा हृदा च य एनं विदुरमृतास्ते भवन्ति । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ६ ॥ उस परमात्माका स्वरूप किसी दूसरेकी तुलनामें नहीं आ सकता; उसे कोई चर्मचक्षुओंसे नहीं देख सकता। जो निश्चयात्मिका बुद्धिसे, मनसे और हृदयसे उसे जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं। उस सनातन भगवान्‌का योगीजन साक्षात्कार करते हैं³॥ ६ ॥

द्वादशपूगां सरितं पिबन्तो देवरक्षिताम् । मध्वीक्षन्तश्च ते तस्याः संचरन्तीह घोराम् । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम् ॥ ७ ॥ जो दस इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—इन बारहके समुदायसे युक्त है तथा जो परमात्मासे सुरक्षित है, उस संसाररूप भयंकर नदीके विषयरूप मधुर जलको