महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 402, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमय दुर्योधनको इस युद्धके कारण भारी पछतावा होगा ।। ३६ ।। यदा विराटः परवीरघाती रणान्तरे शत्रुचमूं प्रवेष्टा । मत्स्यैः सार्धमनृशंसरूपै- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ३७ ।। जब शत्रु-वीरोंका संहार करनेवाले राजा विराट सौम्य स्वरूपवाले मत्स्यदेशीय योद्धाओंको साथ लेकर रणभूमिमें शत्रुसेनाके भीतर प्रवेश करेंगे, उस समय दुर्योधन युद्ध छेड़नेका परिणाम सोचकर शोकसे संतप्त हो उठेगा ।। ३७ ।। ज्येष्ठं मात्स्यमनृशंसार्यरूपं विराटपुत्रं रथिनं पुरस्तात् । यदा द्रष्टा दंशितं पाण्डवार्थे तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ३८ ।। सौम्य तथा श्रेष्ठ स्वरूपवाले राजा विराटके ज्येष्ठ पुत्र मत्स्यदेशीय महारथी श्वेतको जब दुर्योधन पाण्डवोंके हितके लिये कवच धारण किये देखेगा, तब उसे युद्धका परिणाम सोचकर मन-ही-मन बड़ा कष्ट होगा ।। ३८ ।। रणे हते कौरवाणां प्रवीरे शिखण्डिना सत्तमे शान्तनूजे । न जातु नः शत्रवो धारयेयु- रसंशयं सत्यमेतद् ब्रवीमि ।। ३९ ।। कौरववंशके प्रमुख वीर शान्तनुनन्दन साधुशिरो-मणि भीष्मजी जब युद्धमें शिखण्डीके हाथसे मार दिये जायँगे, उस समय हमारे शत्रु कौरव कभी हमलोगोंका वेग नहीं सह सकेंगे, यह मैं सत्य कहता हूँ, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ।। ३९ ।। यदा शिखण्डी रथिनः प्रचिन्वन् भीष्मं रथेनाभियाता वरूथी । दिव्यैर्हयैरवमृद्नन् रथौघां- स्तदा युद्धं धार्तराष्ट्रोऽन्वतप्स्यत् ।। ४० ।। जब शिखण्डी अपने रथकी रक्षाके साधनोंसे सम्पन्न हो रथियोंको चुन-चुनकर मारता तथा दिव्य अश्वोंद्वारा रथसमूहोंको रौंदता हुआ रथारूढ़ हो भीष्मपर आक्रमण करेगा, उस समय दुर्योधनको युद्ध छिड़ जानेके कारण बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। ४० ।। यदा द्रष्टा सृंजयानामनीके धृष्टद्युम्नं प्रमुखे रोचमानम् । अस्त्रं यस्मै गुह्यमुवाच धीमान् द्रोणस्तदा तप्स्यति धार्तराष्ट्रः ।। ४१ ।।