महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवव्रे चाहं वज्रहस्तान्महेन्द्रा- दस्मिन् युद्धे वासुदेवं सहायम्। स मे लब्धो दस्युवधाय कृष्णो मन्ये चैतद् विहितं दैवतैर्मे ॥ ६९ ॥ ‘उस समय मैंने वज्रपाणि इन्द्रको छोड़कर इस युद्धमें भगवान् श्रीकृष्णको अपना सहायक चुना था, इस प्रकार इन डाकुओंके वधके लिये मुझे श्रीकृष्ण मिल गये हैं। मालूम होता है, देवताओंने ही मेरे लिये ऐसी व्यवस्था कर रखी है ।। ६९ ।।
अयुद्ध्यमानो मनसापि यस्य जयं कृष्णः पुरुषस्याभिनन्देत्। एवं सर्वान् स व्यतीयादमित्रान् सेन्द्रान् देवान् मानुषे नास्ति चिन्ता ॥ ७० ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध न करके मनसे भी जिस पुरुषकी विजयका अभिनन्दन करेंगे, वह अपने समस्त शत्रुओंको, भले ही वे इन्द्र आदि देवता ही क्यों न हों, पराजित कर देता है, फिर मनुष्य-शत्रुके लिये तो चिन्ता ही क्या है? ।। ७० ।।
स बाहुभ्यां सागरमुत्तितीर्षे- न्महोदधिं सलिलस्याप्रमेयम्।