भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 416

‘हमारे पास कितने ही ऐसे वृद्ध ब्राह्मण विद्यमान हैं, जो अनेक शास्त्रोंके विद्वान्, सुशील, उत्तम कुलमें उत्पन्न, वर्षके शुभाशुभ फलोंको जाननेवाले, ज्योतिष-शास्त्रके मर्मज्ञ तथा ग्रह-नक्षत्रोंके योगफलका निश्चित-रूपसे ज्ञान रखनेवाले हैं ।। ९८ ।।

उच्चावचं दैवयुक्तं रहस्यं दिव्याः प्रश्ना मृगचक्रा मुहूर्ताः । क्षयं महान्तं कुरुसृंजयानां निवेदयन्ते पाण्डवानां जयं च ।। ९९ ।।

‘वे दैवसम्बन्धी उन्नति एवं अवनतिके फलदायक रहस्य बता सकते हैं। प्रश्नोंके अलौकिक ढंगसे उत्तर देते हैं, जिससे भविष्य घटनाओंका ज्ञान हो जाता है। वे शुभाशुभ फलोंका वर्णन करनेके लिये सर्वतोभद्र आदि चक्रोंका भी अनुसंधान करते हैं और मुहूर्तशास्त्रके तो वे पण्डित ही हैं। वे सब लोग निश्चितरूपसे यह निवेदन करते हैं कि कौरवों और सृंजयवंशके लोगोंका बड़ा भारी संहार होनेवाला है और इस महायुद्धमें पाण्डवोंकी विजय होगी ।। ९९ ।।

यथा हि नो मन्यतेऽजातशत्रुः संसिद्धार्थो द्विषतां निग्रहाय । जनार्दनश्चाप्यपरोक्षविद्यो न संशयं पश्यति वृष्णिसिंहः ।। १०० ।।

‘अजातशत्रु महाराज युधिष्ठिर मानते हैं, मैं अपने शत्रुओंका दमन करनेमें निश्चय सफल होऊँगा। वृष्णिवंशके पराक्रमी वीर भगवान् श्रीकृष्णको भी सारी विद्याओंका अपरोक्ष ज्ञान है। वे भी हमारे इस मनोरथके सिद्ध होनेमें कोई संदेह नहीं देखते हैं ।। १०० ।।

अहं तथैवं खलु भाविरूपं पश्यामि बुद्ध्या स्वयमप्रमत्तः । दृष्टिश्च मे न व्यथते पुराणी संयुध्यमाना धार्तराष्ट्रा न सन्ति ।। १०१ ।।

‘मैं भी स्वयं प्रमादशून्य होकर अपनी बुद्धिसे भावीका ऐसा ही स्वरूप देखता हूँ। मेरी चिरंतन दृष्टि कभी तिरोहित नहीं होती। उसके अनुसार मैं यह निश्चितरूपसे कह सकता हूँ कि युद्धभूमिमें उतरनेपर धृतराष्ट्रके पुत्र जीवित नहीं रह सकते ।। १०१ ।।

अनालब्धं जृम्भति गाण्डिवं धनु- रनाहता कम्पति मे धनुर्ज्या । बाणाश्च मे तूणमुखाद् विसृत्य मुहुर्मुहुर्गन्तुमुशन्ति चैव ।। १०२ ।।

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