महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें‘जब धनञ्जयने अकेले ही समस्त कौरवोंपर आक्रमण किया और सबको मूर्च्छित करके उनके वस्त्र छीन लिये थे, उस समय यह कर्ण क्या कहीं परदेश चला गया था? ।। ३९ ।।
गन्धर्वैर्घोषयात्रायां ह्रियते यत् सुतस्तव ।
क्व तदा सूतपुत्रोऽभूद् य इदानीं वृषायते ।। ४० ।।
‘घोषयात्राके समय जब गन्धर्वलोग तुम्हारे पुत्रको कैद करके लिये जा रहे थे, उस समय यह सूतपुत्र कहाँ था? जो इस समय साँड़की तरह डँकार रहा है ।। ४० ।।
ननु तत्रापि भीमेन पार्थेन च महात्मना ।
यमाभ्यामेव संगम्य गन्धर्वास्ते पराजिताः ।। ४१ ।।
‘वहाँ भी तो महात्मा भीमसेन, अर्जुन और नकुल-सहदेवने ही मिलकर उन गन्धर्वोंको परास्त किया था ।।
एतान्यस्य मृषोक्तानि बहूनि भरतर्षभ ।
विकत्थनस्य भद्रं ते सदा धर्मार्थलोपिनः ।। ४२ ।।
‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारा भला हो। यह कर्ण व्यर्थ ही शेखी बघारता रहता है। इसकी कही हुई बहुत-सी बातें इसी तरह झूठी हैं। यह तो धर्म और अर्थ—दोनोंका ही लोप करनेवाला है ।। ४२ ।।
भीष्मस्य तु वचः श्रुत्वा भारद्वाजो महामनाः ।
धृतराष्ट्रमुवाचेदं राजमध्येऽभिपूजयन् ।। ४३ ।।
भीष्मजीकी यह बात सुनकर महामना द्रोणाचार्यने समस्त राजाओंके मध्यमें उनकी प्रशंसा करते हुए राजा धृतराष्ट्रसे इस प्रकार कहा— ।। ४३ ।।
यदाह भरतश्रेष्ठो भीष्मस्तत् क्रियतां नृप ।
न काममर्थलिप्सूनां वचनं कर्तुमर्हसि ।। ४४ ।।
‘नरेश्वर! भरतकुलतिलक भीष्मजीने जो कहा है, वही कीजिये। जो लोग अर्थ और कामके लोभी हैं, उनकी बातें आपको नहीं माननी चाहिये ।। ४४ ।।
पुरा युद्धात् साधु मन्ये पाण्डवैः सह संगतुम् ।
यद् वाक्यमर्जुनेनोक्तं संजयेन निवेदितम् ।। ४५ ।।
सर्वं तदपि जानामि करिष्यति च पाण्डवः ।
‘मैं तो युद्धसे पहले पाण्डवोंके साथ संधि करना ही अच्छा समझता हूँ। अर्जुनने जो बात कही है और संजयने उनका जो संदेश यहाँ सुनाया है, मैं वह सब जानता और समझता हूँ। पाण्डुनन्दन अर्जुन वैसा करके ही रहेंगे ।। ४५ ½ ।।
न ह्यस्य त्रिषु लोकेषु सदृशोऽस्ति धनुर्धरः ।। ४६ ।।
‘तीनों लोकोंमें अर्जुनके समान कोई धनुर्धर नहीं है ।। ४६ ।।
अनादृत्य तु तद् वाक्यमर्थवद् द्रोणभीष्मयोः ।