महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 428, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
संजयद्वारा युधिष्ठिरके प्रधान सहायकोंका वर्णन
धृतराष्ट्र उवाच
किमसौ पाण्डवो राजा धर्मपुत्रोऽभ्यभाषत । श्रुत्वेह बहुलाः सेनाः प्रीत्यर्थं नः समागताः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! हमारी प्रसन्नता और सहायताके लिये यहाँ हस्तिनापुरमें बहुत-सी सेना एकत्र हो गयी है, यह समाचार सुनकर पाण्डवराज धर्मपुत्र युधिष्ठिरने क्या कहा? ॥ १ ॥
किमसौ चेष्टते सूत योत्स्यमानो युधिष्ठिरः । के वास्य भ्रातृपुत्राणां पश्यन्त्याज्ञेप्सवो मुखम् ॥ २ ॥
सूत! भविष्यमें होनेवाले युद्धके लिये उद्यत होकर राजा युधिष्ठिर कैसी तैयारी कर रहे हैं? उनके भाइयों और पुत्रोंमेंसे कौन-कौन-से लोग उनसे किसी कार्यके लिये आज्ञा पानेकी इच्छासे उनका मुँह जोहते रहते हैं? ॥ २ ॥
के स्विदेनं वारयन्ति युद्धाच्छाम्येति वा पुनः । निकृत्या कोपितं मन्दैर्धर्मज्ञं धर्मचारिणम् ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर धर्मके ज्ञाता हैं और धर्मके आचरणमें सदा तत्पर रहते हैं। मेरे मन्दबुद्धि पुत्रोंने अपने कपटपूर्ण बर्तावसे उन्हें कुपित कर दिया है। वहाँ कौन-कौन ऐसे हैं, जो उन्हें बारंबार शान्त रहनेकी सलाह देकर युद्धसे रोकते हैं? ॥ ३ ॥
संजय उवाच
राज्ञो मुखमुदीक्षन्ते पञ्चालाः पाण्डवैः सह । युधिष्ठिरस्य भद्रं ते स सर्वाननुशास्ति च ॥ ४ ॥
संजयने कहा—महाराज! आपका कल्याण हो। पांचाल और पाण्डव सभी राजा युधिष्ठिरके मुखकी ओर देखते रहते हैं और वे उन सबको विभिन्न कार्योंके लिये आज्ञा देते हैं ॥ ४ ॥
पृथग्भूताः पाण्डवानां पञ्चालानां रथव्रजाः । आयान्तमभिनन्दन्ति कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ५ ॥
जब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर सामने आते हैं, तब पाण्डवों तथा पांचालोंके रथसमूह पृथक्-पृथक् श्रेणियोंमें खड़े होकर उनका अभिनन्दन करते हैं ॥ ५ ॥
नभः सूर्यमिवोद्यन्तं कौन्तेयं दीप्ततेजसम् । पञ्चालाः प्रतिनन्दन्ति तेजोराशिमिवोदितम् ॥ ६ ॥