महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 445, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवे महाधनुर्धर भीष्म आदि पुरातन स्वर्गीय मार्गका आश्रय ले पार्थिव यशकी रक्षा करते हुए घमासान युद्धमें अपने प्राण त्याग देंगे ।। ४८ ।।
यथैषां मामकास्तात तथैषां पाण्डवा अपि ।
पौत्रा भीष्मस्य शिष्याश्च द्रोणस्य च कृपस्य च ।। ४९ ।।
तात! इनके लिये जैसे मेरे पुत्र हैं, वैसे ही पाण्डव भी हैं। दोनों ही भीष्मके पौत्र तथा द्रोण और कृपके शिष्य हैं ।। ४९ ।।
यदस्मदाश्रयं किंचिद् दत्तमिष्टं च संजय ।
तस्यापचितिमार्यत्वात् कर्तारः स्थविरास्त्रयः ।। ५० ।।
संजय! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य—ये तीनों वृद्ध श्रेष्ठ पुरुष हैं; अतः हमारे आश्रयमें रहकर इन्होंने जो कुछ भी दान-यज्ञ आदि किया है, ये उसका बदला चुकायेंगे (युद्धमें दुर्योधनका ही साथ देंगे) ।। ५० ।।
आददानस्य शस्त्रं हि क्षत्रधर्मं परीप्सतः ।
निधनं क्षत्रियस्याजौ वरमेवाहुरुत्तमम् ।। ५१ ।।
जो अस्त्र-शस्त्र धारण करके क्षात्रधर्मकी रक्षा करना चाहता है, उस क्षत्रियके लिये संग्राममें होनेवाली मृत्युको ही श्रेष्ठ एवं उत्तम माना गया है ।। ५१ ।।
स वै शोचामि सर्वान् वै ये युयुत्सन्ति पाण्डवैः ।
विक्रुष्टं विदुरेणादौ तदेतद् भयमागतम् ।। ५२ ।।
जो लोग पाण्डवोंसे युद्ध करना चाहते हैं, उन सबके लिये मुझे बड़ा शोक हो रहा है। विदुरने पहले ही उच्चस्वरसे जिसकी घोषणा की थी, वही यह भय आज आ पहुँचा है ।। ५२ ।।
न तु मन्ये विघाताय ज्ञानं दुःखस्य संजय ।
भवत्यतिबलं ह्येतज्ज्ञानस्याप्युपघातकम् ।। ५३ ।।
संजय! मुझे तो ऐसा मालूम होता है कि ज्ञान दुःखका नाश नहीं कर सकता, अपितु प्रबल दुःख ही ज्ञानका भी नाश करनेवाला बन जाता है ।। ५३ ।।
ऋषयो ह्यपि निर्मुक्ताः पश्यन्तो लोकसंग्रहान् ।
सुखैर्भवन्ति सुखिनस्तथा दुःखेन दुःखिताः ।। ५४ ।।
जीवन्मुक्त महर्षि भी लोकव्यवहारकी ओर दृष्टि रखकर सुखके साधनोंसे सुखी और दुःखसे दुःखी होते हैं ।। ५४ ।।
किं पुनर्मोहमासक्तस्तत्र तत्र सहस्रधा ।
पुत्रेषु राज्यदारेषु पौत्रेष्वपि च बन्धुषु ।। ५५ ।।
फिर जो पुत्र, राज्य, पत्नी, पौत्र तथा बन्धु-बान्धवोंमें जहाँ-तहाँ सहस्रों प्रकारसे मोहवश आसक्त हो रहा है, उसकी तो बात ही क्या है? ।। ५५ ।।
संशये तु महत्यस्मिन् किं नु मे क्षममुत्तरम् ।