महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 458, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रको धैर्य देते हुए दुर्योधनद्वारा अपने उत्कर्ष और पाण्डवोंके अपकर्षका वर्णन
दुर्योधन उवाच
न भेतव्यं महाराज न शोच्या भवता वयम्।
समर्थाः स्म पराज्जेतुं बलिनः समरे विभो ॥ १ ॥
दुर्योधन बोला— महाराज! आप डरें नहीं; आपके द्वारा हमलोग शोक करनेयोग्य नहीं हैं। प्रभो! हम बलवान् और शक्तिशाली हैं तथा समरभूमिमें शत्रुओंको जीतनेकी शक्ति रखते हैं ॥ १ ॥
वने प्रव्राजितान् पार्थान् यदाऽऽयान्मधुसूदनः ।
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना ॥ २ ॥
केकया धृष्टकेतुश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।
राजानश्चान्वयुः पार्थान् बहवोऽन्येऽनुयायिनः ॥ ३ ॥
पाण्डवोंको जब हमने वनमें भेज दिया, उस समय शत्रुओंके राष्ट्रोंको धूलमें मिला देनेवाले विशाल सैन्यसमूहके साथ श्रीकृष्ण यहाँ आये थे। उनके साथ केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न तथा और भी बहुत-से नरेश, जो पाण्डवोंके अनुयायी हैं, यहाँतक पधारे थे ॥ २-३ ॥