भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 465

भीष्म, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा तथा कृपाचार्यके चलाये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंसे विद्ध होकर कुन्तीपुत्र अर्जुनको विवशतापूर्वक यमलोकमें जाना पड़ेगा॥

पितामहोऽपि गाङ्गेयः शान्तनोरधि भारत॥ ४६॥
ब्रह्मर्षिसदृशो जज्ञे देवैरपि सुदुःसहः।
भरतनन्दन! हमारे पितामह गङ्गापुत्र भीष्मजी तो अपने पिता शान्तनुसे भी बढ़कर पराक्रमी हैं। ये ब्रह्मर्षियोंके समान प्रभावसे सम्पन्न होकर उत्पन्न हुए हैं। इनका वेग देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुःसह है॥ ४६ १/२॥

न हन्ता विद्यते चापि राजन् भीष्मस्य कश्चन॥ ४७॥
पित्रा ह्युक्तः प्रसन्नेन नाकामस्त्वं मरिष्यसि।
राजन्! भीष्मजीको मारनेवाला तो कोई है ही नहीं; क्योंकि उनके पिताने प्रसन्न होकर उन्हें यह वरदान दिया है कि तुम अपनी इच्छाके बिना नहीं मरोगे॥ ४७ १/२॥

ब्रह्मर्षेश्च भरद्वाजाद् द्रोणो द्रोण्यामजायत॥ ४८॥
द्रोणाज्जज्ञे महाराज द्रौणिश्च परमास्त्रवित्।
दूसरे वीर आचार्य द्रोण हैं, जो ब्रह्मर्षि भरद्वाजके वीर्यसे कलशमें उत्पन्न हुए हैं। महाराज! इन्हीं आचार्य द्रोणसे वीर अश्वत्थामाकी उत्पत्ति हुई है, जो अस्त्र-विद्याके बहुत बड़े पण्डित हैं॥ ४८ १/२॥

कृपश्चाचार्यमुख्योऽयं महर्षेर्गौतमादपि॥ ४९॥
शरस्तम्बोद्भवः श्रीमानवध्य इति मे मतिः।
आचार्योंमें प्रधान कृप भी महर्षि गौतमके अंशसे सरकण्डोंके समूहमें उत्पन्न हुए हैं। ये श्रीमान् आचार्यपाद अवध्य हैं, ऐसा मेरा विश्वास है॥ ४९ १/२॥

अयौनिजास्त्रयो ह्येते पिता माता च मातुलः॥ ५०॥
अश्वत्थाम्नो महाराज स च शूरः स्थितो मम।
सर्व एते महाराज देवकल्पा महारथाः॥ ५१॥
महाराज! अश्वत्थामाके ये पिता, माता और मामा तीनों ही अयोनिज हैं। अश्वत्थामा भी शूरवीर एवं मेरे पक्षमें स्थित हैं। राजन्! ये सभी योद्धा देवताओंके समान पराक्रमी एवं महारथी हैं॥ ५०-५१॥

शक्रस्यापि व्यथां कुर्युः संयुगे भरतर्षभ।
नैतेषामर्जुनः शक्त एकैकं प्रति वीक्षितुम्॥ ५२॥
भरतश्रेष्ठ! ये चारों वीर युद्धमें देवराज इन्द्रको भी पीड़ा दे सकते हैं। अर्जुन तो इनमेंसे किसी एककी ओर भी आँख उठाकर देख नहीं सकते॥ ५२॥

सहितास्तु नरव्याघ्रा हनिष्यन्ति धनंजयम्।
भीष्मद्रोणकृपाणां च तुल्यः कर्णो मतो मम॥ ५३॥

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