महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 471, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीमसेनके अनुरोधकी रक्षाके लिये पवननन्दन हनुमान्जी उस ध्वजमें युद्धके समय अपने स्वरूपको स्थापित करेंगे ॥ ९ ॥ सर्वा दिशो योजनमात्रमन्तरं स तिर्यगूर्ध्वं च रुरोध वै ध्वजः। न सज्जतेऽसौ तरुभिः संवृतोऽपि तथा हि माया विहिता भौमनेन ॥ १० ॥ उस ध्वजने एक योजनतक सम्पूर्ण दिशाओं तथा अगल-बगल एवं ऊपरके अवकाशको व्याप्त कर रखा था। विश्वकर्माने ऐसी माया रच रखी है कि वह ध्वज वृक्षोंसे आवृत अथवा अवरुद्ध होनेपर भी कहीं अटकता नहीं है ॥ १० ॥ यथाऽऽकाशे शक्रधनुः प्रकाशते न चैकवर्णं न च वेद्मि किं नु तत्। तथा ध्वजो विहितो भौमनेन बह्वाकारं दृश्यते रूपमस्य ॥ ११ ॥ जैसे आकाशमें बहुरंगा इन्द्रधनुष प्रकाशित होता है और यह समझमें नहीं आता कि वह क्या है? ठीक ऐसा ही विश्वकर्माका बनाया हुआ वह रंग-बिरंगा ध्वज है। उसका रूप अनेक प्रकारका दिखायी देता है ॥ यथाग्निधूमो दिवमेति रुद्ध्वा वर्णान् बिभ्रत् तैजसांश्चित्ररूपान्। तथा ध्वजो विहितो भौमनेन न चेद् भारो भविता नोत रोधः ॥ १२ ॥ जैसे अग्निसहित धूम विचित्र तेजोमय आकार और रंग धारण करके सब ओर फैलकर ऊपर आकाशकी ओर बढ़ता जाता है, उसी प्रकार विश्वकर्माने उस ध्वजका निर्माण किया है। उसके कारण रथपर कोई भार नहीं बढ़ता है और न उसकी गतिमें कहीं कोई रुकावट ही पैदा होती है ॥ १२ ॥ श्वेतास्तस्मिन् वातवेगाः सदश्वा दिव्या युक्ताश्चित्ररथेन दत्ताः। भुव्यन्तरिक्षे दिवि वा नरेन्द्र येषां गतिर्हीयते नात्र सर्वा। शतं यत् तत् पूर्यते नित्यकालं हतं हतं दत्तवरं पुरस्तात् ॥ १३ ॥ अर्जुनके उस रथमें वायुके समान वेगशाली दिव्य एवं उत्तम जातिके श्वेत अश्व जुते हुए हैं, जिन्हें गन्धर्वराज चित्ररथने दिया था। नरेन्द्र! पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्ग आदि किसी भी स्थानमें उन अश्वोंकी पूर्ण गति क्षीण या अवरुद्ध नहीं होती है। उस रथमें पूरे सौ घोड़े सदा