महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकस्तांस्तरस्विनो भूयः संदीपयति पाण्डवान् । अर्चिष्मतो महेष्वासान् हविषा पावकानिव ॥ ४६ ॥ संजय! तुम पुनः मेरे सामने पाण्डवोंकी चेष्टाका वर्णन करो। कौन ऐसा वीर है, जो वेगशाली और तेजस्वी महाधनुर्धर पाण्डवोंको बार-बार उसी प्रकार उत्तेजित किया करता है, जैसे घीकी आहुति डालनेसे आग प्रज्वलित हो उठती है ॥ ४५-४६ ॥
संजय उवाच
धृष्टद्युम्नः सदैवैतान् संदीपयति भारत । युद्ध्यध्वमिति मा भैष्ट युद्धाद् भरतसत्तमाः ॥ ४७ ॥ संजयने कहा—भारत! धृष्टद्युम्न सदा ही इन पाण्डवोंको उत्तेजित करते रहते हैं। वे कहते हैं—'भरतकुलभूषण पाण्डवो! आपलोग युद्ध करें, उससे तनिक भी भयभीत न हों ॥ ४७ ॥
ये केचित् पार्थिवास्तत्र धार्तराष्ट्रेण संवृताः । युद्धे समागमिष्यन्ति तुमुले शस्त्रसंकुले ॥ ४८ ॥ तान् सर्वानहवे क्रुद्धान् सानुबन्धान् समागतान् । अहमेकः समादास्ये तिमिर्मत्स्यानिवाौदकान् ॥ ४९ ॥ 'धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके द्वारा एकत्र किये हुए जो-जो नरेश अस्त्र-शस्त्रोंकी मारकाटसे व्याप्त हुए भयानक संग्राममें मेरे सामने आयेंगे, वे कितने ही क्रोधमें भरे हुए क्यों न हों, सगे-सम्बन्धियोंसहित रणभूमिमें आये हुए उन सभी राजाओंको मैं अकेला ही उसी प्रकार वशमें कर लूँगा, जैसे तिमि नामक महामत्स्य जलकी दूसरी मछलियोंको निगल जाता है ॥
भीष्मं द्रोणं कृपं कर्णं द्रौणिं शल्यं सुयोधनम् । एतांश्चापि निरोत्स्यामि वेलेव मकरालयम् ॥ ५० ॥ 'भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य तथा दुर्योधन—इन सबको मैं उसी भाँति आगे बढ़नेसे रोक दूँगा, जैसे किनारा समुद्रको रोके रखता है' ॥ ५० ॥
तथा ब्रुवन्तं धर्मात्मा प्राह राजा युधिष्ठिरः । तव धैर्यं च वीर्यं च पञ्चालाः पाण्डवैः सह ॥ ५१ ॥ सर्वे समधिरूढाः स्म संग्रामान्नः समुद्धर । जानामि त्वां महाबाहो क्षत्रधर्मे व्यवस्थितम् ॥ ५२ ॥ समर्थमेकं पर्याप्तं कौरवाणां विनिग्रहे । पुरस्तादुपयातानां कौरवाणां युयुत्सताम् ॥ ५३ ॥ इस प्रकार बोलते हुए धृष्टद्युम्नसे धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने कहा—'महाबाहो! पाण्डवोंसहित समस्त पांचाल वीर तुम्हारे धैर्य और पराक्रमका ही आश्रय लेकर युद्धके लिये उद्यत हुए हैं, इसलिये तुम्हीं इस संग्रामसे हमलोगोंका उद्धार करो। मैं जानता हूँ कि