भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 49

मेरा ऐसा विश्वास है कि आप सिद्धान्तवेत्ताओंमें प्रमुख हैं। आपका कुल तो श्रेष्ठ है ही, अवस्था तथा शास्त्र-ज्ञानमें भी आप बढ़े-चढ़े हैं ।। ३ ।। प्रज्ञया सदृशश्चासि शुक्रेणाङ्गिरसेन च । विदितं चापि ते सर्वं यथावृत्तः स कौरवः ।। ४ ।। आपकी बुद्धि शुक्राचार्य और बृहस्पतिके समान है। दुर्योधनका आचार-विचार जैसा है, वह सब भी आपको ज्ञात ही है ।। ४ ।। पाण्डवश्च यथावृत्तः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । धृतराष्ट्रस्य विदिते वञ्चिताः पाण्डवाः परैः ।। ५ ।। कुन्तीपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरका आचार-विचार भी आपलोगोंसे छिपा नहीं है। धृतराष्ट्रकी जानकारीमें शत्रुओंने पाण्डवोंको ठगा है ।। ५ ।। विदुरेणानुनीतोऽपि पुत्रमेवानुवर्तते । शकुनिर्बुद्धिपूर्वं हि कुन्तीपुत्रं समाह्वयत् ।। ६ ।। अनक्षज्ञं मताक्षः सन् क्षत्रवृत्ते स्थितं शुचिम् । विदुरजीके अनुनय-विनय करनेपर भी धृतराष्ट्र अपने पुत्रका ही अनुसरण करते हैं। शकुनिने स्वयं जूएके खेलमें प्रवीण होकर यह जानते हुए भी कि युधिष्ठिर जूएके खिलाड़ी नहीं हैं, वे क्षत्रियधर्मपर चलनेवाले शुद्धात्मा पुरुष हैं, उन्हें समझ-बूझकर जूएके लिये बुलाया ।। ६ ½ ।। ते तथा वञ्चयित्वा तु धर्मराजं युधिष्ठिरम् ।। ७ ।। न कस्याञ्चिदवस्थायां राज्यं दास्यन्ति वै स्वयम् । उन सबने मिलकर धर्मराज युधिष्ठिरको ठगा है। अब वे किसी भी अवस्थामें स्वयं राज्य नहीं लौटायेंगे ।। भवांस्तु धर्मसंयुक्तं धृतराष्ट्रं ब्रुवन् वचः ।। ८ ।। मनांसि तस्य योधानां ध्रुवमावर्तयिष्यति । परंतु आप राजा धृतराष्ट्रसे धर्मयुक्त बातें कहकर उनके योद्धाओंका मन निश्चय ही अपनी ओर फेर लेंगे ।। ८ ½ ।। विदुरश्चापि तद् वाक्यं साधयिष्यति तावकम् ।। ९ ।। भीष्मद्रोणकृपादीनां भेदं संजनयिष्यति । दुरजी भी वहाँ आपके वचनोंका समर्थन करेंगे तथा आप भीष्म, द्रोण एवं कृपाचार्य आदिमें भेद उत्पन्न कर देंगे ।। ९ ½ ।। अमात्येषु च भिन्नेषु योधेषु विमुखेषु च ।। १० ।। पुनरेकत्रकरणं तेषां कर्म भविष्यति । जब मन्त्रियोंमें फूट पड़ जायगी और योद्धा भी विमुख होकर चल देंगे, तब उनका (प्रधान) कार्य होगा—पुनः नूतन सेनाका संग्रह और संगठन ।। १० ½ ।।