महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 490, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों वीर जिस विशाल आसनपर बैठे थे, वह सोनेका बना हुआ था। उसमें अनेक प्रकारके रत्न जटित होनेके कारण उसकी विचित्र शोभा हो रही थी। उसपर भाँति-भाँतिके सुन्दर बिछौने बिछे हुए थे ।। ६ ।। अर्जुनोत्सङ्गगौ पादौ केशवस्योपलक्षये । अर्जुनस्य च कृष्णायां सत्यायां च महात्मनः ।। ७ ।। मैंने देखा, श्रीकृष्णके दोनों चरण अर्जुनकी गोदमें थे और महात्मा अर्जुनका एक पैर द्रौपदीकी तथा दूसरा सत्यभामाकी गोदमें था ।। ७ ।। काञ्चनं पादपीठं तु पार्थो मे प्रादिशत् तदा । तदहं पाणिना स्पृष्ट्वा ततो भूमावुपाविशम् ।। ८ ।। कुन्तीकुमार अर्जुनने उस समय मुझे बैठनेके लिये एक सोनेके पादपीठ (पैर रखनेके पीढ़े)-की ओर संकेत कर दिया। परंतु मैं हाथसे उसका स्पर्शमात्र करके पृथ्वीपर ही बैठ गया ।। ८ ।। ऊर्ध्वरेखातलौ पादौ पार्थस्य शुभलक्षणौ । पादपीठादपहृतौ तत्रापश्यमहं शुभौ ।। ९ ।। बैठ जानेपर वहाँ मैंने पादपीठसे हटाये हुए अर्जुनके दोनों सुन्दर चरणोंको (ध्यानपूर्वक) देखा। उनके तलुओंमें ऊर्ध्वगामिनी रेखाएँ दृष्टिगोचर हो रही थीं और वे दोनों पैर शुभसूचक विविध लक्षणोंसे सम्पन्न थे ।। ९ ।। श्यामौ बृहन्तौ तरुणौ शालस्कन्धाविवोद्गतौ । एकासनगतौ दृष्ट्वा भयं मां महदाविशत् ।। १० ।। श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों श्यामवर्ण, बड़े डील-डौलवाले, तरुण तथा शालवृक्षके स्कन्धोंके समान उन्नत हैं। उन दोनोंको एक आसनपर बैठे देख मेरे मनमें बड़ा भय समा गया ।। १० ।। इन्द्रविष्णुसमावेतौ मन्दात्मा नावबुद्ध्यते । संश्रयाद् द्रोणभीष्माभ्यां कर्णस्य च विकत्थनात् ।। ११ ।। मैंने सोचा, इन्द्र और विष्णुके समान अचिन्त्य शक्तिशाली इन दोनों वीरोंको मन्दबुद्धि दुर्योधन नहीं समझ पाता है। वह द्रोणाचार्य और भीष्मका भरोसा करके तथा कर्णकी डींगभरी बातें सुनकर मोहित हो रहा है ।। ११ ।। निदेशस्थाविमौ यस्य मानसस्तस्य सेत्स्यते । संकल्पो धर्मराजस्य निश्चयो मे तदाभवत् ।। १२ ।। ये दोनों महात्मा जिनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सदा उद्यत रहते हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरका मानसिक संकल्प अवश्य सिद्ध होगा; यही उस समय मेरा निश्चय हुआ था ।। १२ ।। सत्कृतश्चान्नपानाभ्यामासीनो लब्धसत्क्रियः ।