महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 496, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंवानरश्च ध्वजो दिव्यो निःसङ्गो धूमवद्गतिः । रथश्च चतुरन्तायां यस्य नास्ति समः क्षितौ ॥ १३ ॥ महामेघनिभश्चापि निर्घोषः श्रूयते जनैः । महाशनिसमः शब्दः शात्रवाणां भयंकरः ॥ १४ ॥ यं चातिमानुषं वीर्ये कृत्स्नो लोको व्यवस्यति । देवानामपि जेतारं यं विदुः पार्थिवा रणे ॥ १५ ॥ शतानि पञ्च चैवेषून् यो गृह्णन् नैव दृश्यते । निमेषान्तरमात्रेण मुञ्चन् दूरं च पातयन् ॥ १६ ॥ यमाह भीष्मो द्रोणश्च कृपो द्रौणिस्तथैव च । मद्रराजस्तथा शल्यो मध्यस्था ये च मानवाः ॥ १७ ॥ युद्धायावस्थितं पार्थं पार्थिवैरतिमानुषैः । अशक्यं नरशार्दूलं पराजेतुमरिंदमम् ॥ १८ ॥ क्षिपत्येकेन वेगेन पञ्च बाणशतानि यः । सदृशं बाहुवीर्येण कार्तवीर्यस्य पाण्डवम् ॥ १९ ॥ तमर्जुनं महेष्वासं महेन्द्रोपेन्द्रविक्रमम् । निघ्नन्तमिव पश्यामि विमर्देऽस्मिन् महाहवे ॥ २० ॥
‘जिसके पास उत्तम एवं दुर्धर्ष दिव्य गाण्डीव धनुष है, वरुणके दिये हुए बाणोंसे भरे दो दिव्य अक्षय तूणीर हैं, जिसका दिव्य वानरध्वज कहीं भी अटकता नहीं है—धूमकी भाँति अप्रतिहत गतिसे सर्वत्र जा सकता है, समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीपर जिसके रथकी समानता करनेवाला दूसरा कोई रथ नहीं है, जिसके रथका घर्घर शब्द सब लोगोंको महान् मेघोंकी गर्जनाके समान सुनायी पड़ता है तथा वज्रकी गड़गड़ाहटके समान शत्रुसैनिकोंके मनमें भयका संचार कर देता है, जिसे सब लोग अलौकिक पराक्रमी मानते हैं, समस्त राजा भी जिसे युद्धमें देवताओंतकको पराजित करनेमें समर्थ समझते हैं, जो पलक मारते-मारते पाँच सौ बाणोंको हाथमें लेता, छोड़ता और दूरस्थ लक्ष्योंको भी मार गिराता है; किंतु यह सब करते समय कोई भी जिसे देख नहीं पाता है; जिसके विषयमें भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य तथा तटस्थ मनुष्य भी ऐसा कहते हैं कि युद्धके लिये खड़े हुए शत्रुदमन नरश्रेष्ठ अर्जुनको पराजित करना अमानुषिक शक्ति रखनेवाले भूमिपालोंके लिये भी असम्भव है। जो एक वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है तथा जो बाहुबलमें कार्तवीर्य अर्जुनके समान है; इन्द्र और विष्णुके समान पराक्रमी उस महाधनुर्धर पाण्डुनन्दन अर्जुनको मैं इस महासमरमें शत्रु-सेनाओंका संहार करता हुआ-सा देख रहा हूँ॥ १२-२० ॥
इत्येवं चिन्तयत् कृत्स्नमहोरात्राणि भारत । अनिद्रो निःसुखश्चास्मि कुरूणां शमचिन्तया ॥ २१ ॥