महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 501, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनान्यथा भूतपूर्वं च सत्यवागिति मां विदुः ॥ २२ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! मैं जो बात मुँहसे कह देता हूँ कि यह इसी प्रकार होगा, मेरा वह कथन पहले कभी भी मिथ्या नहीं हुआ है। इसीलिये लोग मुझे सत्यवादी मानते हैं ।। २२ ।।
लोकसाक्षिकमेतन्मे माहात्म्यं दिक्षु विश्रुतम् । आश्वासनार्थं भवतः प्रोक्तं न श्लाघया नृप ॥ २३ ॥ ‘राजन्! मेरा यह माहात्म्य सब लोगोंकी आँखोंके समक्ष है; सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रसिद्ध है। मैंने आपके आश्वासनके लिये ही इसकी यहाँ चर्चा की है, आत्मप्रशंसा करनेके लिये नहीं ॥ २३ ॥
न ह्यहं श्लाघनो राजन् भूतपूर्वः कदाचन । असदाचरितं ह्येतद् यदात्मानं प्रशंसति ॥ २४ ॥ ‘महाराज! आजसे पहले मैंने कभी भी आत्मप्रशंसा नहीं की है; क्योंकि मनुष्य जो अपनी प्रशंसा करता है, यह अच्छे पुरुषोंका कार्य नहीं है ॥ २४ ॥
पाण्डवांश्चैव मत्स्यांश्च पञ्चालान् केकयैः सह । सात्यकिं वासुदेवं च श्रोतासि विजितान् मया ॥ २५ ॥ ‘आप किसी दिन सुनेंगे कि मैंने पाण्डवोंको, मत्स्यदेशके योद्धाओंको, केकयोंसहित पांचालोंको तथा सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णको भी जीत लिया है ॥ २५ ॥
सरितः सागरं प्राप्य यथा नश्यन्ति सर्वशः । तथैव ते विनङ्क्ष्यन्ति मामासाद्य सहानुयाः ॥ २६ ॥ ‘जैसे नदियाँ समुद्रमें मिलकर सब प्रकारसे अपना अस्तित्व खो बैठती हैं, उसी प्रकार वे पाण्डव आदि योद्धा मेरे पास आनेपर अपने कुल-परिवारसहित नष्ट हो जायँगे ॥ २६ ॥
परा बुद्धिः परं तेजो वीर्यं च परमं मम । परा विद्या पते योगो मम तेभ्यो विशिष्यते ॥ २७ ॥ ‘मेरी बुद्धि उत्तम है, तेज उत्कृष्ट है, बल-पराक्रम महान् है, विद्या बड़ी है तथा उद्योग भी सबसे बढ़कर है। ये सारी वस्तुएँ पाण्डवोंकी अपेक्षा मुझमें अधिक हैं ।। २७ ।।
पितामहश्च द्रोणश्च कृपः शल्यः शलस्तथा । अस्त्रेषु यत् प्रजानन्ति सर्वं तन्मयि विद्यते ॥ २८ ॥ ‘पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, शल्य तथा शल—ये लोग अस्त्रविद्याके विषयमें जो कुछ जानते हैं, वह सारा ज्ञान मुझमें विद्यमान है' ॥ २८ ॥
इत्युक्ते संजयं भूयः पमेयपृच्छत भारतः । ज्ञात्वा युयुत्सोः कार्याणि प्राप्तकालमरिंदम ॥ २९ ॥ शत्रुओंका दमन करनेवाले जनमेजय! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर भरतनन्दन धृतराष्ट्रने युद्धकी इच्छा रखनेवाले दुर्योधनके अभिप्रायको समझकर पुनः संजयसे समयोचित प्रश्न