महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाशमेकमुभावेतौ सहितौ हरतो मम । यत्र वै विवदिष्येते तत्र मे वशमेष्यतः ॥ ७ ॥ **व्याध बोला—**मुने! ये दोनों पक्षी आपसमें मिल गये हैं, अतः मेरे एकमात्र जालको लिये जा रहे हैं। अब ये जहाँ-कहीं एक दूसरेसे झगड़ेंगे, वहीं मेरे वशमें आ जायँगे ॥ ७ ॥
विदुर उवाच
तौ विवादमनुप्राप्तौ शकुनौ मृत्युसंधितौ । विगृह्य च सुदुर्बुद्धी पृथिव्यां संनिपेततुः ॥ ८ ॥ **विदुरजी कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर कुछ ही देरमें कालके वशीभूत हुए वे दोनों दुर्बुद्धि पक्षी आपसमें झगड़ने लगे और लड़ते-लड़ते पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ८ ॥
तौ युध्यमानौ संरब्धौ मृत्युपाशवशानुगौ । उपसृत्यापरिज्ञातो जग्राह मृगहा तदा ॥ ९ ॥ जब मौतके फंदेमें फँसे हुए वे पक्षी अत्यन्त कुपित होकर एक-दूसरेसे लड़ रहे थे, उसी समय व्याधने चुपचाप उनके पास आकर उन दोनोंको पकड़ लिया ॥ ९ ॥ एवं ये ज्ञातयोऽर्थेषु मिथो गच्छन्ति विग्रहम् । तेऽमित्रवशमायान्ति शकुनाविव विग्रहात् ॥ १० ॥