महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजनार्दनं समासाद्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ) अभ्यभाषत दाशार्हमृषभं सर्वसात्वताम् ॥ १ ॥ समस्त यदुवंशियोंमें श्रेष्ठ दशार्हकुलनन्दन जनार्दन श्रीकृष्णके पास पहुँचकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥
अयं स कालः सम्प्राप्तो मित्राणां मित्रवत्सल । न च त्वदन्यं पश्यामि यो न आपत्सु तारयेत् ॥ २ ॥ ‘मित्रवत्सल श्रीकृष्ण! मित्रोंकी सहायताके लिये यही उपयुक्त अवसर आया है। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इस विपत्तिसे हमलोगोंका उद्धार करे ॥ २ ॥
त्वां हि माधवमाश्रित्य निर्भया मोघदर्पितम् । धार्तराष्ट्रं सहामात्यं स्वयं समनुयुङ्क्ष्महे ॥ ३ ॥ ‘आप माधवकी शरणमें आकर हम सब लोग निर्भय हो गये हैं और व्यर्थ ही घमंड दिखानेवाले धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन तथा उसके मन्त्रियोंको हम स्वयं युद्धके लिये ललकार रहे हैं ॥ ३ ॥
यथा हि सर्वास्वापत्सु पासि वृष्णीनरिंदम ।