महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनुष्य उत्तम कुलमें जन्म लेकर और वृद्ध होनेपर भी यदि दूसरोंके धनको लेना चाहता है तो वह लोभ उसकी विचारशक्तिको नष्ट कर देता है। विचारशक्ति नष्ट होनेपर उसकी लज्जाको भी नष्ट कर देती है ।। १८ ।। ह्रीर्हता बाधते धर्मं धर्मो हन्ति हतः श्रियम् । श्रीर्हता पुरुषं हन्ति पुरुषस्याधनं वधः ।। १९ ।। नष्ट हुई लज्जा धर्मको नष्ट कर देती है। नष्ट हुआ धर्म मनुष्यकी सम्पत्तिका नाश कर देता है और नष्ट हुई सम्पत्ति उस मनुष्यका विनाश कर देती है, क्योंकि धनका अभाव ही मनुष्यका वध है ।। १९ ।। अधनाद्धि निवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदो द्विजाः । अपुष्पादफलाद् वृक्षाद् यथा कृष्ण पतत्रिणः ।। २० ।। श्रीकृष्ण! धनहीन पुरुषसे उसके भाई-बन्धु, सुहृद् और ब्राह्मणलोग भी उसी प्रकार मुँह मोड़ लेते हैं, जैसे पक्षी पुष्प और फलसे हीन वृक्षको छोड़कर उड़ जाते हैं ।। २० ।। एतच्च मरणं तात यन्मत्तः पतितादिव । ज्ञातयो विनिवर्तन्ते प्रेतसत्त्वादिवासवः ।। २१ ।। तात! जैसे पतित मनुष्यके निकटसे लोग दूर भागते हैं और जैसे मृत शरीरसे प्राण निकल जाते हैं, उसी प्रकार मेरे कुटुम्बीजन भी जो मुझसे मुँह मोड़ रहे हैं, यही मेरे लिये मरण है ।। २१ ।। नातः पापीयसीं काञ्चिदवस्थां शम्बरोऽब्रवीत् । यत्र नैवाद्य न प्रातर्भोजनं प्रतिदृश्यते ।। २२ ।। जहाँ आज और कल सबेरेके लिये भोजन नहीं दिखायी देता, उस दरिद्रतासे बढ़कर दूसरी कोई दुःखदायिनी अवस्था नहीं है; यह शम्बरका कथन है ।। २२ ।। धनमाहुः परं धर्मं धने सर्वं प्रतिष्ठितम् । जीवन्ति धनिनो लोके मृता ये त्वधना नराः ।। २३ ।। धनको उत्तम धर्मका साधक बताया गया है। धनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है। संसारमें धनी मनुष्य ही जीवन धारण करते हैं। जो निर्धन हैं, वे तो मरे हुएके ही समान हैं ।। २३ ।। ये धनादपकर्षन्ति नरं स्वबलमास्थिताः । ते धर्ममर्थं कामं च प्रमथ्नन्ति नरं च तम् ।। २४ ।। जो लोग अपने बलमें स्थित होकर किसी मनुष्यको धनसे वंचित कर देते हैं, वे उसके धर्म, अर्थ और कामको तो नष्ट करते ही हैं, उस मनुष्यको भी नष्ट कर देते हैं ।। २४ ।। एतामवस्थां प्राप्यैके मरणं वव्रिरे जनाः । ग्रामायैके वनायैके नाशायैके प्रवव्रजुः ।। २५ ।। इस निर्धन अवस्थाको पाकर कितने ही मनुष्योंने मृत्युका वरण किया है। कुछ लोग गाँव छोड़कर दूसरे गाँवमें जा बसे हैं, कितने ही जंगलोंमें चले गये हैं और कितने ही मनुष्य