महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 554, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् तुभ्यं रोचते कृष्ण स्वस्ति प्राप्नुहि कौरवान् ।
कृतार्थं स्वस्तिमन्तं त्वां द्रक्ष्यामि पुनरागतम् ॥ ८९ ॥
युधिष्ठिर बोले- श्रीकृष्ण! आपकी जैसी रुचि हो, वही कीजिये। आपका कल्याण
हो। आप प्रसन्नतापूर्वक कौरवोंके पास जाइये। आशा है, मैं पुनः आपको अपने कार्यमें
सफल होकर यहाँ सकुशल लौटा हुआ देखूँगा ॥ ८९ ॥
विष्वक्सेन कुरून् गत्वा भरताञ्छमय प्रभो ।
यथा सर्वे सुमनसः सह स्याम सुचेतसः ॥ ९० ॥
विष्वक्सेन प्रभो! आप कुरुदेशमें जाकर भरत-वंशियोंको शान्त कीजिये, जिससे हम
सब लोग शुद्ध हृदयसे प्रसन्नचित्त होकर एक साथ रह सकें ॥ ९० ॥
भ्राता चासि सखा चासि बीभत्सोर्मम च प्रियः ।
सौहृदेनाविशङ्क्योऽसि स्वस्ति प्राप्नुहि भूतये ॥ ९१ ॥
आप हमलोगोंके भाई और मित्र हैं। अर्जुनके तथा मेरे भी प्रीतिभाजन हैं। आपके
सौहार्दके विषयमें हमारे मनमें कोई शंका नहीं है। अतः आप उभय पक्षोंकी भलाईके लिये
वहाँ जाइये। आपका कल्याण हो ॥ ९१ ॥
अस्मान् वेत्थ परान् वेत्थ वेत्थार्थान् वेत्थ भाषितुम् ।
यद् यदस्मद्धितं कृष्ण तत् तद् वाच्यः सुयोधनः ॥ ९२ ॥
श्रीकृष्ण! आप हमको जानते हैं, कौरवोंको भी जानते हैं, हम दोनोंके स्वार्थोंसे भी
आप अपरिचित नहीं हैं और बातचीत कैसे करनी चाहिये, यह भी आपको अच्छी तरह
ज्ञात है। अतः जिस-जिस बातसे हमारा हित हो, वह सब आप दुर्योधनको बतावें ॥ ९२ ॥
यद् यद् धर्मेण संयुक्तमुपपद्येद्धितं वचः ।
तत् तत् केशव भाषेथाः सान्त्वं वा यदि वेतरत् ॥ ९३ ॥
केशव! जो-जो बात धर्मसंगत, युक्तियुक्त और हितकर हो, वह सब कोमल हो या
कठोर, आप अवश्य कहें ॥ ९३ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि युधिष्ठिरकृतकृष्णप्रेरणे
द्विसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें युधिष्ठिरद्वारा श्रीकृष्णको
प्रेरणाविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७२ ॥
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ९८ १/३ श्लोक हैं।]
- कुत्तोंके दुम हिलानेके समान राजाओंका ध्वज-कम्पन है, उनके गुर्रानेकी जगह उनका सिंहनाद है। कुत्ते जो एक-
दूसरेको देखकर गर्जते हैं, उसी प्रकार दो विरोधी क्षत्रिय एक-दूसरेके प्रति उत्तर-प्रत्युत्तरके रूपमें आक्षेपजनक बातें कहते
हैं। एक-दूसरेके निकट जाना दोनोंमें समानरूपसे होता है। राजालोग क्रोधमें आकर जो दाँतोंसे होठ चबाते हैं, यही