महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिघ्नन् पद्भिः क्षितिं भीम निष्टनन् परिधावसि ॥ ८ ॥ भीम! जैसे हाथी वृक्षोंको जड़-मूलसहित उखाड़कर उन्हें पैरोंकी ठोकरोंसे टूक-टूक कर डालता है, उसी प्रकार तुम भी पैरोंसे पृथ्वीपर आघात करते हुए जोर-जोरसे गर्जते और चारों ओर दौड़ते थे ॥ ८ ॥ नास्मिञ्जनेऽभिरमसे रहः क्षिपसि पाण्डव । नान्यं निशि दिवा चापि कदाचिदभिनन्दसि ॥ ९ ॥ पाण्डुनन्दन! तुम कभी इस जनसमुदायमें प्रसन्नताका अनुभव नहीं करते थे; सदा एकान्तमें ही बैठकर कालक्षेप करते थे। दिन हो या रात, तुम कभी किसी दूसरेका अभिनन्दन नहीं करते थे ॥ ९ ॥ अकस्मात् स्मयमानश्च रहस्यास्से रुदन्निव । जान्वोर्मूर्धानमाधाय चिरमास्से प्रमीलितः ॥ १० ॥ कभी सहसा हँस पड़ते और कभी एकान्त स्थानमें रोते हुए-से प्रतीत होते थे और कभी घुटनोंपर मस्तक रखकर दीर्घकालतक नेत्र बंद किये बैठे रहते थे ॥ १० ॥ भ्रुकुटिं च पुनः कुर्वन्नोष्ठौ च विदशन्निव । अभीक्ष्णं दृश्यसे भीम सर्वं तन्मन्युकारितम् ॥ ११ ॥ भीमसेन! मैंने बार-बार तुम्हें भौंहें टेढ़ी करके दोनों ओठोंको चबाते हुए-से देखा है। यह सब तुम्हारे क्रोधकी करतूत है ॥ ११ ॥ यथा पुरस्तात् सविता दृश्यते शुक्रमुच्चरन् । यथा च पश्चान्निर्मुक्तो ध्रुवं पर्येति रश्मिवान् ॥ १२ ॥ तथा सत्यं ब्रवीम्येतन्नास्ति तस्य व्यतिक्रमः । हन्ताहं गदयाभ्येत्य दुर्योधनममर्षणम् ॥ १३ ॥ इति स्म मध्ये भ्रातॄणां सत्येनालभसे गदाम् । तस्य ते प्रशमे बुद्धिर्ध्रियतेऽद्य परंतप ॥ १४ ॥ तुम अपने भाइयोंके बीचमें सत्यकी शपथ खाकर बार-बार गदा छूते हुए यह कहते थे—‘जैसे सूर्यदेव पूर्वदिशामें उदित होते हुए अपने तेजोमण्डलको प्रकट करते दिखायी देते हैं और पश्चिमदिशामें वे ही अंशुमाली अस्ताचलको जाकर निश्चितरूपसे मेरुपर्वतकी परिक्रमा करते हैं, उनके इस नियममें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ता; उसी प्रकार मैं यह सच कहता हूँ कि अमर्षशील दुर्योधनके पास जाकर अपनी गदासे उसके प्राण ले लूँगा। मेरे इस कथनमें कभी कोई अन्तर नहीं पड़ सकता।' परंतप! ऐसी प्रतिज्ञा करनेवाले तुम-जैसे वीरशिरोमणिकी बुद्धि आज शान्ति-स्थापनमें लग रही है; (यह आश्चर्यकी बात है!) ॥ १२—१४ ॥ अहो युद्धाभिकाङ्क्षाणां युद्धकाल उपस्थिते । चेतांसि विप्रतीपानि यत् त्वां भीर्भीम विन्दति ॥ १५ ॥