भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 592

इति दुर्योधनो वाच्यः सुहृदश्चास्य केशव ॥ ८ ॥ महातेजस्वी केशव! (इन्होंने संजयसे इस प्रकार कहा था—) संजय! तुम दुर्योधन और उसके सुहृदोंके सामने मेरी यह माँग रख देना—‘तात! तुम हमें अविस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत तथा अन्तिम पाँचवाँ कोई एक गाँव—इन पाँच गाँवोंको ही दे दो’॥ न चापि ह्यकरोद् वाक्यं श्रुत्वा कृष्ण सुयोधनः । युधिष्ठिरस्य दाशार्ह श्रीमतः संधिमिच्छतः ॥ ९ ॥ दाशार्हकुलभूषण श्रीकृष्ण! संधिकी इच्छा रखनेवाले श्रीमान् युधिष्ठिरका यह (नम्रतापूर्ण) वचन सुनकर भी उसे दुर्योधनने स्वीकार नहीं किया ॥ ९ ॥ अप्रदानेन राज्यस्य यदि कृष्ण सुयोधनः । संधिमिच्छेन्न कर्तव्यं तत्र गत्वा कथञ्चन ॥ १० ॥ भगवन्! आपके वहाँ जानेपर यदि दुर्योधन राज्य दिये बिना ही संधि करना चाहे तो आप इसे किसी तरह स्वीकार न कीजियेगा ॥ १० ॥ शक्ष्यन्ति हि महाबाहो पाण्डवाः सृंजयैः सह । धार्तराष्ट्रबलं घोरं क्रुद्धं प्रतिसमासितुम् ॥ ११ ॥ महाबाहो! पाण्डवलोग सृंजय वीरोंके साथ क्रोधमें भरी हुई दुर्योधनकी भयंकर सेनाका अच्छी तरह सामना कर सकते हैं ॥ ११ ॥ न हि साम्ना न दानेन शक्योऽर्थस्तेषु कश्चन । तस्मात् तेषु न कर्तव्या कृपा ते मधुसूदन ॥ १२ ॥ मधुसूदन! कौरवोंके प्रति साम और दाननीतिका प्रयोग करनेसे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। अतः उनपर आपको कभी कृपा नहीं करनी चाहिये ॥ साम्ना दानेन वा कृष्ण ये न शाम्यन्ति शत्रवः । योक्तव्यस्तेषु दण्डः स्वाज्जीवितं परिरक्षता ॥ १३ ॥ श्रीकृष्ण! अपने जीवनकी रक्षा करनेवाले पुरुषको चाहिये कि जो शत्रु साम और दानसे शान्त न हों, उनपर दण्डका प्रयोग करे ॥ १३ ॥ तस्मात् तेषु महादण्डः क्षेप्तव्यः क्षिप्रमच्युत । त्वया चैव महाबाहो पाण्डवैः सह सृंजयैः ॥ १४ ॥ अतः महाबाहु अच्युत! आपको तथा सृंजयोंसहित पाण्डवोंको उचित है कि वे उन शत्रुओंको शीघ्र ही महान् दण्ड दें ॥ १४ ॥ एतत् समर्थं पार्थानां तव चैव यशस्करम् । क्रियमाणं भवेत् कृष्ण क्षत्रस्य च सुखावहम् ॥ १५ ॥ यही कुन्तीकुमारोंके योग्य कार्य है। श्रीकृष्ण! यदि यह किया जाय तो आपके भी यशका विस्तार होगा और समस्त क्षत्रियसमुदायको भी सुख मिलेगा ॥ क्षत्रियेण हि हन्तव्यः क्षत्रियो लोभमास्थितः ।