महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३- धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद ३४- धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीके नीतियुक्त वचन ३५- विदुरके द्वारा केशिनीके लिये सुधन्वाके साथ विरोचनके विवादका वर्णन करते हुए धृतराष्ट्रको धर्मोपदेश ३६- दत्तात्रेय और साध्य देवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको लक्षण समझाना ३७- धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका हितोपदेश ३८- विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश ३९- धृतराष्ट्रके प्रति विदुरजीका नीतियुक्त उपदेश ४०- धर्मकी महत्ताका प्रतिपादन तथा ब्राह्मण आदि चारों वर्णोंके धर्मका संक्षिप्त वर्णन
(सनत्सुजातपर्व)
४१- विदुरजीके द्वारा स्मरण करनेपर आये हुए सनत्सुजात ऋषिसे धृतराष्ट्रको उपदेश देनेके लिये उनकी प्रार्थना ४२- सनत्सुजातजीके द्वारा धृतराष्ट्रके विविध प्रश्नोंका उत्तर ४३- ब्रह्मज्ञानमें उपयोगी मौन, तप, त्याग, अप्रमाद एवं दम आदिके लक्षण तथा मदादि दोषोंका निरूपण ४४- ब्रह्मचर्य तथा ब्रह्मका निरूपण ४५- गुण-दोषोंके लक्षणोंका वर्णन और ब्रह्मविद्याका प्रतिपादन ४६- परमात्माके स्वरूपका वर्णन और योगीजनोके द्वारा उनके साक्षात्कारका प्रतिपादन
(यानसंधिपर्व)
४७- पाण्डवोंके यहाँसे लौटे हुए संजयका कौरव-सभामें आगमन ४८- संजयका कौरवसभामें अर्जुनका संदेश सुनाना ४९- भीष्मका दुर्योधनको संधिके लिये समझाते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महिमा बताना एवं कर्णपर आक्षेप करना, कर्णकी आत्मप्रशंसा, भीष्मके द्वारा उसका पुनः उपहास एवं द्रोणाचार्यद्वारा भीष्मजीके कथनका अनुमोदन ५०- संजयद्वारा युधिष्ठिरके प्रधान सहायकोंका वर्णन ५१- भीमसेनके पराक्रमसे डरे हुए धृतराष्ट्रका विलाप ५२- धृतराष्ट्रद्वारा अर्जुनसे प्राप्त होनेवाले भयका वर्णन ५३- कौरवसभामें धृतराष्ट्रका युद्धसे भय दिखाकर शान्तिके लिये प्रस्ताव करना ५४- संजयका धृतराष्ट्रको उनके दोष बताते हुए दुर्योधनपर शासन करनेकी सलाह देना