भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

इस प्रकार इन महाभाग महर्षियों तथा साधु-महात्माओंसे सम्मानित हो श्रीकृष्णने कुरुकुलकी राजधानी हस्तिनापुरकी ओर प्रस्थान किया ॥ २९ ॥ तं प्रयान्तमनुप्रायात् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । भीमसेनार्जुनौ चोभौ माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ ॥ ३० ॥ चेकितानश्च विक्रान्तो धृष्टकेतुश्च चेदिपः । द्रुपदः काशिराजश्च शिखण्डी च महारथः ॥ ३१ ॥ धृष्टद्युम्नः सपुत्रश्च विराटः केकयैः सह । संसाधनार्थं प्रययुः क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥ ३२ ॥ क्षत्रियशिरोमणे! श्रीकृष्णके जाते समय उन्हें पहुँचानेके लिये कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उनके पीछे-पीछे चले। साथ ही भीमसेन, अर्जुन, माद्रीके दोनों पुत्र पाण्डुकुमार नकुल-सहदेव, पराक्रमी चेकितान, चेदिराज धृष्टकेतु, द्रुपद, काशिराज, महारथी शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, पुत्रों और केकयोंसहित राजा विराट—ये सभी क्षत्रिय अभीष्ट कार्यकी सिद्धि एवं शिष्टाचारका पालन करनेके लिये उनके पीछे गये ॥ ३०—३२ ॥ ततोऽनुव्रज्य गोविन्दं धर्मराजो युधिष्ठिरः । राज्ञां सकाशे द्युतिमानुवाचेदं वचस्तदा ॥ ३३ ॥ इस प्रकार गोविन्दके पीछे कुछ दूर जाकर तेजस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने राजाओंके समीप उनसे कुछ कहनेका विचार किया ॥ ३३ ॥ यो वै न कामान्न भयान्न लोभान्नार्थकारणात् । अन्यायमनुवर्तेत स्थिरबुद्धिरलोलुपः ॥ ३४ ॥ धर्मज्ञो धृतिमान् प्राज्ञः सर्वभूतेषु केशवः । ईश्वरः सर्वभूतानां देवदेवः सनातनः ॥ ३५ ॥ जो कभी कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा अन्य किसी प्रयोजनके कारण भी अन्यायका अनुसरण नहीं कर सकते, जिनकी बुद्धि स्थिर है, जो लोभ-रहित, धर्मज्ञ, धैर्यवान्, विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंके भीतर विराजमान हैं, वे भगवान् केशव देवताओंके भी देवता, सनातन परमेश्वर तथा समस्त प्राणियोंके ईश्वर हैं ॥ ३४-३५ ॥ तं सर्वगुणसम्पन्नं श्रीवत्सकृतलक्षणम् । सम्परिष्वज्य कौन्तेयः संदेष्टुमुपचक्रमे ॥ ३६ ॥ उन्हीं सर्वगुणसम्पन्न श्रीवत्सचिह्नसे विभूषित भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने निम्नांकित संदेश देना आरम्भ किया ॥ ३६ ॥