महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंन तु त्वं धर्ममुद्दिश्य तस्य वा प्रियकारणात् । एतद् दित्ससि कृष्णाय सत्येनात्मानमालभे ॥ ७ ॥ मैं सत्यकी शपथ खाकर अपने शरीरको छूकर कहता हूँ कि आप धर्मपालनके उद्देश्यसे अथवा श्रीकृष्णका प्रिय करनेके लिये उन्हें वे सब वस्तुएँ नहीं देना चाहते हैं ॥ ७ ॥
मायैषा सत्यमेवैतच्छद्मैतद् भूरिदक्षिण । जानामि त्वन्मतं राजन् गूढं बाह्येन कर्मणा ॥ ८ ॥ यज्ञोंमें बहुत-सी दक्षिणा देनेवाले महाराज! मैं सच कहता हूँ। यह सब आपकी माया और प्रवंचनामात्र है। आपके इन बाह्यव्यवहारोंमें छिपा हुआ जो आपका वास्तविक अभिप्राय है, उसे मैं समझता हूँ ॥ ८ ॥
पञ्च पञ्चैव लिप्सन्ति ग्रामकान् पाण्डवा नृप । न च दित्ससि तेभ्यस्तांस्तच्छमं न करिष्यसि ॥ ९ ॥ नरेन्द्र! बेचारे पाँचों भाई पाण्डव आपसे केवल पाँच गाँव ही पाना चाहते हैं; परंतु आप उन्हें वे गाँव भी नहीं देना चाहते हैं। इससे स्पष्ट सूचित होता है कि आप (सन्धिद्वारा) शान्तिस्थापन नहीं करेंगे ॥ ९ ॥
अर्थेन तु महाबाहुं वार्ष्णेयं त्वं जिहीर्षसि । अनेन चाप्युपायेन पाण्डवेभ्यो बिभेत्स्यसि ॥ १० ॥ आप तो धन देकर महाबाहु श्रीकृष्णको अपने पक्षमें लाना चाहते हैं और इस उपायसे आप यह आशा रखते हैं कि आप उन्हें पाण्डवोंकी ओरसे फोड़ लेंगे ॥ १० ॥
न च वित्तेन शक्योऽसौ नोद्यमेन न गर्हया । अन्यो धनंजयात् कर्तुमेतत् तत्त्वं ब्रवीमि ते ॥ ११ ॥ परंतु मैं आपको असली बात बताये देता हूँ; आप धन देकर अथवा दूसरा कोई उद्योग या निन्दा करके श्रीकृष्णको अर्जुनसे पृथक् नहीं कर सकते ॥ ११ ॥
वेद कृष्णस्य माहात्म्यं वेदास्य दृढभक्तिताम् । अत्याज्यमस्य जानामि प्राणैस्तुल्यं धनंजयम् ॥ १२ ॥ मैं श्रीकृष्णके माहात्म्यको जानता हूँ। श्रीकृष्णके प्रति अर्जुनकी जो सुदृढ़ भक्ति है, उससे भी परिचित हूँ। अतः मैं यह निश्चितरूपसे जानता हूँ कि श्रीकृष्ण अपने प्राणोंके समान प्रिय सखा अर्जुनको कभी त्याग नहीं सकते ॥ १२ ॥
अन्यत् कुम्भादपां पूर्णादन्यत् पादावसेचनात् । अन्यत् कुशलसम्पप्रश्नान्नैषिष्यति जनार्दनः ॥ १३ ॥ इसलिये आपकी दी हुई वस्तुओंमेंसे जलसे भरे हुए कलश, पैर धोनेके लिये जल और कुशल-प्रश्नको छोड़कर दूसरी किसी वस्तुको श्रीकृष्ण नहीं स्वीकार करेंगे ॥ १३ ॥
यत् त्वस्य प्रियमातिथ्यं मानार्हस्य महात्मनः ।