महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरायणं पाण्डवानां नियच्छामि जनार्दनम् ।। १३ ।। इस समय मैंने जो यह महान् कार्य करनेका निश्चय किया है, उसे सुनिये। पाण्डवोंके सबसे बड़े सहारे श्रीकृष्णको यहाँ आनेपर मैं कैद कर लूँगा ।। १३ ।।
तस्मिन् बद्धे भविष्यन्ति वृष्णयः पृथिवी तथा । पाण्डवाश्च विधेया मे स च प्रातरिहैष्यति ।। १४ ।। उनके कैद हो जानेपर समस्त यदुवंशी, इस भूमण्डलका राज्य तथा पाण्डव भी मेरी आज्ञाके अधीन हो जायँगे। श्रीकृष्ण कल सबेरे यहाँ आ ही जायँगे ।।
अत्रोपायान् यथा सम्यङ् न बुद्ध्येत जनार्दनः । न चापायो भवेत् कश्चित् तद् भवान् प्रब्रवीतु मे ।। १५ ।। अतः इस विषयमें जो अच्छे उपाय हों, जिनसे श्रीकृष्णको इन बातोंका पता न लगे और मेरे इस मन्तव्यमें कोई विघ्न न पड़ सके, उन्हें आप मुझे बताइये ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा घोरं कृष्णाभिसंहितम् । धृतराष्ट्रः सहामात्यो व्यथितो विमनाभवत् ।। १६ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! श्रीकृष्णसे छल करनेके विषयमें दुर्योधनकी वह भयंकर बात सुनकर धृतराष्ट्र अपने मन्त्रियोंके साथ बहुत दुःखी और उदास हो गये ।। १६ ।।
ततो दुर्योधनमिदं धृतराष्ट्रोऽब्रवीद् वचः । मैवं वोचः प्रजापाल नैष धर्मः सनातनः ।। १७ ।। तदनन्तर धृतराष्ट्रने दुर्योधनसे कहा—'प्रजापालक दुर्योधन! तुम ऐसी बात मुँहसे न निकालो। यह सनातन धर्म नहीं है ।। १७ ।।
दूतश्च हि हृषीकेशः सम्बन्धी च प्रियश्च नः । अपापः कौरवेयेषु स कथं बन्धमर्हति ।। १८ ।। 'श्रीकृष्ण इस समय दूत बनकर आ रहे हैं। वे हमारे प्रिय और सम्बन्धी भी हैं तथा उन्होंने कौरवोंका कोई अपराध भी नहीं किया है। ऐसी दशामें वे कैद करनेके योग्य कैसे हो सकते हैं?' ।। १८ ।।
भीष्म उवाच
परीतस्तव पुत्रोऽयं धृतराष्ट्र सुमन्दधीः । वृणोत्यनर्थं नैवार्थं याच्यमानः सुहृज्जनैः ।। १९ ।। यह सुनकर भीष्मजीने कहा—धृतराष्ट्र! तुम्हारा यह मन्दबुद्धि पुत्र कालके वशमें हो गया है। यह अपने हितैषी सुहृदोंके कहने-समझानेपर भी अनर्थको ही अपना रहा है; अर्थको नहीं ।। १९ ।।