भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 633

न च कश्चिद् गृहे राजंस्तदाऽऽसीद् भरतर्षभ । न स्त्री न वृद्धो न शिशुर्वासुदेवदिदृक्षया ॥ ७ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस समय भगवान् वासुदेवके दर्शनकी तीव्र इच्छाके कारण स्त्री, बालक अथवा वृद्ध कोई भी घरमें नहीं ठहर सका ॥ ७ ॥ राजमार्गे नरास्तस्मिन् संस्तुवन्त्यवनिं गताः । तस्मिन् काले महाराज हृषीकेशप्रवेशने ॥ ८ ॥ महाराज! जब श्रीकृष्ण नगरमें प्रवेश कर रहे थे, तब राजमार्गमें भूमिपर खड़े हुए मनुष्य उनकी स्तुति करने लगे ॥ ८ ॥ आवृतानि वरस्त्रीभिर्गृहाणि सुमहन्त्यपि । प्रचलन्तीव भारेण दृश्यन्ते स्म महीतले ॥ ९ ॥ (भगवान् श्रीकृष्णको देखनेके लिये एकत्रित हुई) सुन्दरी स्त्रियोंसे भरे हुए बड़े-बड़े महल भी उनके भारसे इस भूतलपर विचलित होते-से दिखायी देते थे ॥ ९ ॥ तथा च गतिमन्तस्ते वासुदेवस्य वाजिनः । प्रणष्टगतयोऽभूवन् राजमार्गे नरैर्वृते ॥ १० ॥ वहाँकी प्रधान सड़क लोगोंसे ऐसी खचाखच भर गयी थी कि श्रीकृष्णके वेगपूर्वक चलनेवाले घोड़ोंकी गति भी अवरुद्ध हो गयी ॥ १० ॥ स गृहं धृतराष्ट्रस्य प्राविशच्छत्रुकर्शनः । पाण्डुरं पुण्डरीकाक्षः प्रासादैरुपशोभितम् ॥ ११ ॥ शत्रुओंको क्षीण करनेवाले कमलनयन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रके अट्टालिकाओंसे सुशोभित उज्ज्वल भवनमें प्रवेश किया ॥ ११ ॥ तिस्रः कक्ष्या व्यतिक्रम्य केशवो राजवेश्मनः । वैचित्रवीर्यं राजानमभ्यगच्छदरिंदमः ॥ १२ ॥