महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 669, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं तो निष्कपटभावसे धृतराष्ट्रके पुत्रों, पाण्डवों तथा भूमण्डलके सभी क्षत्रियोंके हितका ही प्रयत्न करूँगा ॥ १३ ॥ हिते प्रयतमानं मां शङ्केद् दुर्योधनो यदि । हृदयस्य च मे प्रीतिरानृण्यं च भविष्यति ॥ १४ ॥ इस प्रकार हितसाधनके लिये प्रयत्न करनेपर भी यदि दुर्योधन मुझपर शंका करेगा तो भी मेरे मनको तो प्रसन्नता ही होगी और मैं अपने कर्तव्यके भारसे उऋण हो जाऊँगा ॥ १४ ॥ ज्ञातीनां हि मिथो भेदे यन्मित्रं नाभिपद्यते । सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं न तन्मित्रं विदुर्बुधाः ॥ १५ ॥ भाई-बन्धुओंमें परस्पर फूट होनेका अवसर आनेपर जो मित्र सर्वथा प्रयत्न करके उनमें मेल करानेके लिये मध्यस्थता नहीं करता, उसे विद्वान् पुरुष मित्र नहीं मानते हैं ॥ १५ ॥ न मां ब्रूयुरधर्मिष्ठा मूढा ह्यसुहृदस्तथा । शक्तो नावारयत् कृष्णः संरब्धान् कुरुपाण्डवान् ॥ १६ ॥ संसारके पापी, मूढ़ और शत्रुभाव रखनेवाले लोग मेरे विषयमें यह न कहें कि श्रीकृष्णने समर्थ होते हुए भी क्रोधसे भरे हुए कौरव-पाण्डवोंको युद्धसे नहीं रोका (इसलिये भी मैं संधि करानेका प्रयत्न करूँगा) ॥ १६ ॥ उभयोः साधयन्नर्थमहमागत इत्युत । तत्र यत्नमहं कृत्वा गच्छेयं नृष्ववाच्यताम् ॥ १७ ॥ मैं दोनों पक्षोंका स्वार्थ सिद्ध करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ। इसके लिये पूरा प्रयत्न कर लेनेपर मैं लोगोंमें निन्दाका पात्र नहीं बनूँगा ॥ १७ ॥ मम धर्मार्थयुक्तं हि श्रुत्वा वाक्यमनामयम् । न चेदादास्यते बालो दिष्टस्य वशमेष्यति ॥ १८ ॥ यदि मूर्ख दुर्योधन मेरे कष्टनिवारक एवं धर्म तथा अर्थके अनुकूल वचनोंको सुनकर भी उन्हें ग्रहण नहीं करेगा तो उसे दुर्भाग्यके अधीन होना पड़ेगा ॥ १८ ॥ अहापयन् पाण्डवार्थं यथाव- च्छमं कुरूणां यदि चाचरेयम् । पुण्यं च मे स्याच्चरितं महात्मन् मुच्येरंश्च कुरवो मृत्युपाशात् ॥ १९ ॥ महात्मन्! यदि मैं पाण्डवोंके स्वार्थमें बाधा न आने देकर कौरवों तथा पाण्डवोंमें यथायोग्य संधि करा सकूँगा तो मेरे द्वारा यह महान् पुण्यकर्म बन जायगा और कौरव भी मृत्युके पाशसे मुक्त हो जायँगे ॥ १९ ॥ अपि वाचं भाषमाणस्य काव्यां