महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 691, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रमुञ्चेमान् मृत्युपाशात् क्षत्रियान् पुरुषर्षभ ।। ५३ ।। जनेश्वर! आपसे पाण्डवोंका राज्य लौटा देनेके सिवा दूसरी कौन-सी बात यहाँ कही जा सकती है। इस सभामें जो भूमिपाल बैठे हैं, वे धर्म और अर्थका विचार करके स्वयं बतावें, मैं ठीक कहता हूँ या नहीं। पुरुषरत्न! आप इन क्षत्रियोंको मौतके फंदेसे छुड़ाइये ।। ५२-५३ ।।
प्रशाम्य भरतश्रेष्ठ मा मन्युवशमन्वगाः । पित्र्यं तेभ्यः प्रदायांशं पाण्डवेभ्यो यथोचितम् ।। ५४ ।। ततः सपुत्रः सिद्धार्थो भुङ्क्ष्व भोगान् परंतप । भरतश्रेष्ठ! शान्त हो जाइये, क्रोधके वशीभूत न होइये। परंतप! पाण्डवोंको यथोचित पैतृक राज्यभाग देकर अपने पुत्रोंके साथ सफलमनोरथ हो मनोवांछित भोग भोगिये ।। ५४ १/२ ।।
अजातशत्रुं जानीषे स्थितं धर्मे सतां सदा ।। ५५ ।। सपुत्रे त्वयि वृत्तिं च वर्तते यां नराधिप । दाहितश्च निरस्तश्च त्वामेवोपाश्रितः पुनः ।। ५६ ।। नरेश्वर! आप जानते हैं कि अजातशत्रु युधिष्ठिर सदा सत्पुरुषोंके धर्मपर स्थित हैं। उनका पुत्रोंसहित आपके प्रति जो बर्ताव है, उससे भी आप अपरिचित नहीं हैं। आपलोगोंने उन्हें लाक्षागृहकी आगमें जलवाया तथा राज्य और देशसे निकाल दिया; तो भी वे पुनः आपकी ही शरणमें आये हैं ।। ५५-५६ ।।
इन्द्रप्रस्थं त्वयैवासौ सपुत्रेण विवासितः । स तत्र विवसन् सर्वान् वशमानीय पार्थिवान् ।। ५७ ।। त्वन्मुखानकरोद् राजन् न च त्वामत्यवर्तत । पुत्रोंसहित आपने ही युधिष्ठिरको यहाँसे निकालकर इन्द्रप्रस्थका निवासी बनाया। वहाँ रहकर उन्होंने समस्त राजाओंको अपने वशमें किया और उन्हें आपका मुखापेक्षी बना दिया। राजन्! तो भी युधिष्ठिरने कभी आपकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं किया ।। ५७ १/२ ।।
तस्यैवं वर्तमानस्य सौबलेन जिहीर्षता ।। ५८ ।। राष्ट्राणि धनधान्यं च प्रयुक्तः परमोपधिः । ऐसे साधु बर्ताववाले युधिष्ठिरके राज्य तथा धन-धान्यका अपहरण कर लेनेकी इच्छासे सुबलपुत्र शकुनिने जूएके बहाने अपना महान् कपटजाल फैलाया ।।
स तामवस्थां सम्प्राप्य कृष्णां प्रेक्ष्य सभागताम् ।। ५९ ।। क्षत्रधर्मादमेयात्मा नाकम्पत युधिष्ठिरः । उस दयनीय अवस्थामें पहुँचकर अपनी महारानी कृष्णाको सभामें (तिरस्कारपूर्वक) लायी गयी देखकर भी महामना युधिष्ठिर अपने क्षत्रियधर्मसे विचलित नहीं हुए ।।
अहं तु तव तेषां च श्रेय इच्छामि भारत ।। ६० ।।