भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 705

‘जिनका शीलस्वभाव श्रेष्ठ है, जो ऊँचे कुलमें उत्पन्न हुए यशस्वी तथा कोमल अन्तःकरणवाले हैं; ऐसे लोगोंके कुलमें कन्याका उत्पन्न होना दुःखकी ही बात है ॥ मातुः कुलं पितृकुलं यत्र चैव प्रदीयते । कुलत्रयं संशयितं कुरुते कन्यका सताम् ॥ १६ ॥ ‘कन्या मातृकुलको, पितृकुलको तथा जहाँ वह ब्याही जाती है, उस कुलको— सत्पुरुषोंके इन तीनों कुलोंको संशयमें डाल देती है ॥ १६ ॥ देवमानुषलोकौ द्वौ मानुषेणैव चक्षुषा । अवगाह्यैव विचितौ न च मे रोचते वरः ॥ १७ ॥ ‘मैंने मानवदृष्टिके अनुसार देवलोक तथा मनुष्यलोक दोनोंमें अच्छी तरह घूम-फिरकर कन्याके लिये वरका अन्वेषण किया है, पर वहाँ कोई भी वर मुझे पसंद नहीं आ रहा है’ ॥ १७ ॥

कण्व उवाच

न देवान् नैव दितिजान् न गन्धर्वान् न मानुषान् । अरोचयद् वरकृते तथैव बहुलानृषीन् ॥ १८ ॥ कण्व मुनि कहते हैं— मातलिने वरके लिये बहुत-से देवताओं, दैत्यों, गन्धर्वों और मनुष्यों तथा ऋषियोंको भी देखा; परंतु कोई उन्हें पसंद नहीं आया ॥ १८ ॥ भार्यानु स सम्मन्त्र्य सह रात्रौ सुधर्मया । मातलिर्नागलोकाय चकार गमने मतिम् ॥ १९ ॥ तब उन्होंने रातमें अपनी पत्नी सुधर्माके साथ सलाह करके नागलोकमें जानेका विचार किया ॥ १९ ॥ न मे देवमनुष्येषु गुणकेश्याः समो वरः । रूपतो दृश्यते कश्चिन्नागेषु भविता ध्रुवम् ॥ २० ॥ वे अपनी पत्नीसे बोले—‘देवि! देवताओं और मनुष्योंमें तो गुणकेशीके योग्य कोई रूपवान् वर नहीं दिखायी देता। नागलोकमें कोई-न-कोई उसके योग्य वर अवश्य होगा’ ॥ २० ॥ इत्यामन्त्र्य सुधर्मां स कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । कन्यां शिरस्युपाघ्राय प्रविवेश महीतलम् ॥ २१ ॥ सुधर्मासे ऐसी सलाह करके मातलिने इष्टदेवकी परिक्रमा की और कन्याका मस्तक सूँघकर रसातलमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥ ९७ ॥