महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 707, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टनवतितमोऽध्यायः
मातलिकी अपनी पुत्रीके लिये वर खोजनेके निमित्त नारदजीके साथ वरुणलोकमें भ्रमण करते हुए अनेक आश्चर्यजनक वस्तुएँ देखना
कण्व उवाच
मातलिस्तु व्रजन् मार्गे नारदेन महर्षिणा ।
वरुणं गच्छता द्रष्टुं समागच्छद् यदृच्छया ॥ १ ॥
कण्व मुनि कहते हैं—राजन्! उसी समय महर्षि नारद वरुणदेवतासे मिलनेके लिये उधर जा रहे थे। नागलोकके मार्गमें जाते हुए मातलिकी नारदजीके साथ अकस्मात् भेंट हो गयी ॥ १ ॥
नारदोऽथाब्रवीदेनं क्व भवान् गन्तुमुद्यतः ।
स्वेन वा सूत कार्येण शासनाद् वा शतक्रतोः ॥ २ ॥
नारदजीने उनसे पूछा—देवसारथे! तुम कहाँ जानेको उद्यत हुए हो? तुम्हारी यह यात्रा किसी निजी कार्यसे अथवा देवेन्द्रके आदेशसे हुई है? ॥ २ ॥
मातलिर्नारदेनैव सम्पृष्टः पथि गच्छता ।
यथावत् सर्वमाचष्ट स्वकार्यं नारदं प्रति ॥ ३ ॥
मार्गमें जाते हुए नारदजीके इस प्रकार पूछनेपर मातलिने उनसे अपना सारा कार्य यथावत्रूपसे बताया ॥
तमुवाचाथ स मुनिर्गच्छावः सहिताविति ।
सलिलेशदिदृक्षार्थमहमप्युद्यतो दिवः ॥ ४ ॥
तब उन मुनिने मातलिसे कहा—‘हम दोनों साथ-साथ चलें। मैं भी जलके स्वामी वरुणदेवका दर्शन करनेकी इच्छासे देवलोकसे आ रहा हूँ ॥ ४ ॥
अहं ते सर्वमाख्यास्ये दर्शयन् वसुधातलम् ।
दृष्ट्वा तत्र वरं कंचिद् रोचयिष्याव मातले ॥ ५ ॥
‘मैं तुम्हें पृथ्वीके नीचेके लोकोंको दिखाते हुए वहाँकी सब वस्तुओंका परिचय दूँगा। मातले! वहाँ हम दोनों किसी योग्य वरको देखकर पसंद करेंगे’ ॥ ५ ॥
अवगाह तु तौ भूमिमुभौ मातलिनारदौ ।
ददृशाते महात्मानौ लोकपालमपाम्पतिम् ॥ ६ ॥
तदनन्तर मातलि और नारद दोनों महात्मा पृथ्वीके भीतर प्रवेश करके जलके स्वामी लोकपाल वरुणके समीप गये ॥ ६ ॥