भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 713

प्रसूताः सुप्रतीकस्य वंशे वारणसत्तमाः ॥ १५ ॥ यहाँ नागराज ऐरावत, वामन, कुमुद और अंजन नामक श्रेष्ठ गज सुप्रतीकके वंशमें उत्पन्न हुए हैं ॥ १५ ॥

पश्य यद्यत्र ते कश्चिद् रोचते गुणतो वरः । वरयिष्यामि तं गत्वा यत्नमास्थाय मातले ॥ १६ ॥ मातले! देखो, यदि यहाँ तुम्हें कोई गुणवान् वर पसंद हो तो मैं चलकर यत्नपूर्वक उसका वरण करूँगा ॥ १६ ॥

अण्डमेतज्जले न्यस्तं दीप्यमानमिव श्रिया । आ प्रजानां निसर्गाद् वै नोद्भिद्यति न सर्पति ॥ १७ ॥ जलके भीतर यह एक अण्डा रखा हुआ है, जो यहाँ अपनी प्रभासे उद्भासित-सा हो रहा है। जबसे प्रजाजनोंकी सृष्टि आरम्भ हुई है, तबसे लेकर अबतक यह अण्डा न तो फूटता है और न अपने स्थानसे इधर-उधर जाता ही है ॥ १७ ॥

नास्य जातिं निसर्गं वा कथ्यमानं शृणोमि वै । पितरं मातरं चापि नास्य जानाति कश्चन ॥ १८ ॥ इसकी जाति अथवा स्वभावके विषयमें कभी किसीको कुछ कहते नहीं सुना है। इसके पिता और माताको भी कोई नहीं जानता है ॥ १८ ॥

अतः किल महानग्निरन्तकाले समुत्थितः । धक्ष्यते मातले सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ १९ ॥ मातले! कहते हैं, प्रलयकालमें इस अण्डेके भीतरसे बड़ी भारी आग प्रकट होगी, जो चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीको भस्म कर डालेगी ॥ १९ ॥

मातलिस्त्वब्रवीच्छ्रुत्वा नारदस्याथ भाषितम् । न मेऽत्र रोचते कश्चिदन्यतो व्रज माचिरम् ॥ २० ॥ नारदजीका यह भाषण सुनकर मातलिने कहा—'यहाँ मुझे कोई भी वर पसंद नहीं आया; अतः शीघ्र ही अन्यत्र कहीं चलिये' ॥ २० ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे एकोनशततमोऽध्यायः ॥ ९९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९९ ॥