महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 721, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिवसन्ति दिशां पाल्यो धारयन्त्यो दिशः स्म ताः ॥ ७ ॥ मातले! सुरभिकी पुत्रीस्वरूपा चार अन्य धेनुएँ हैं, जो सब दिशाओंमें निवास करती हैं। वे दिशाओंका धारण-पोषण करनेवाली हैं ॥ ७ ॥ पूर्वां दिशं धारयते सुरूपा नाम सौरभी । दक्षिणां हंसिका नाम धारयत्यपरां दिशम् ॥ ८ ॥ सुरूपा नामवाली धेनु पूर्वदिशाको धारण करती है तथा उससे भिन्न दक्षिणदिशाका हंसिका नामवाली धेनु धारण-पोषण करती है ॥ ८ ॥ पश्चिमा वारुणी दिक् च धार्यते वै सुभद्रया । महानुभावया नित्यं मातले विश्वरूपया ॥ ९ ॥ मातले! महाप्रभावशालिनी विश्वरूपा सुभद्रा नामवाली सुरभिकन्याके द्वारा वरुणदेवकी पश्चिमदिशा धारण की जाती है ॥ ९ ॥ सर्वकामदुघा नाम धेनुर्धारयते दिशम् । उत्तरां मातले धर्म्यां तथैलविलसंज्ञिताम् ॥ १० ॥ चौथी धेनुका नाम सर्वकामदुघा है। मातले! वह धर्मयुक्त कुबेरसम्बन्धिनी उत्तरदिशाका धारण-पोषण करती है ॥ १० ॥ आसां तु पयसा मिश्रं पयो निर्मथ्य सागरे । मन्थानं मन्दरं कृत्वा देवैरसुरसंहितैः ॥ ११ ॥ उद्धृता वारुणी लक्ष्मीरमृतं चापि मातले । उच्चैःश्रवाश्चाश्वराजो मणिरत्नं च कौस्तुभम् ॥ १२ ॥ देवसारथे! देवताओंने असुरोंसे मिलकर मन्दराचलको मथानी बनाकर इन्हीं धेनुओंके दूधसे मिश्रित क्षीरसागरकी दुग्धराशिका मन्थन किया और उससे वारुणी, लक्ष्मी एवं अमृतको प्रकट किया। तत्पश्चात् उस समुद्रमन्थनसे अश्वराज उच्चैःश्रवा तथा मणिरत्न कौस्तुभका भी प्रादुर्भाव हुआ था ॥ ११-१२ ॥ सुधाहारेषु च सुधां स्वधाभोजिषु च स्वधाम् । अमृतं चामृताशेषु सुरभी क्षरते पयः ॥ १३ ॥ सुरभि अपने स्तनोंसे जो दूध बहाती है, वह सुधाभोजी लोगोंके लिये सुधा, स्वधाभोजी पितरोंके लिये स्वधा तथा अमृतभोजी देवताओंके लिये अमृतरूप है ॥ अत्र गाथा पुरा गीता रसातलनिवासिभिः । पौराणी श्रूयते लोके गीयते या मनीषिभिः ॥ १४ ॥ यहाँ रसातलनिवासियोंने पूर्वकालमें जो पुरातन गाथा गायी थी, वह अब भी लोकमें सुनी जाती है और मनीषी पुरुष उसका गान करते हैं ॥ १४ ॥ न नागलोके न स्वर्गे न विमाने त्रिविष्टपे । परिवासः सुखस्तादृग् रसातलतले यथा ॥ १५ ॥