महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 728, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरते हैं ॥ ४ ॥ अस्य कन्या वरारोहा रूपेणासदृशी भुवि । सत्यशीलगुणोपेता गुणकेशीति विश्रुता ॥ ५ ॥ इनके एक सुन्दरी कन्या है, जिसके रूपकी समानता भूमण्डलमें कहीं नहीं है। उसका नाम है गुणकेशी। वह सत्य, शील और सद्गुणोंसे सम्पन्न है ॥ ५ ॥ तस्यास्य यत्नाच्चरतस्त्रैलोक्यममरद्युते । सुमुखो भवतः पौत्रो रोचते दुहितुः पतिः ॥ ६ ॥ देवोपम कान्तिवाले नागराज! ये मातलि बड़े प्रयत्नसे कन्याके लिये वर ढूँढ़नेके निमित्त तीनों लोकोंमें विचरते हुए यहाँ आये हैं। आपका पौत्र सुमुख इन्हें अपनी कन्याका पति होनेयोग्य प्रतीत हुआ है; उसीको इन्होंने पसंद किया है ॥ ६ ॥ यदि ते रोचते सम्यग् भुजगोत्तम मा चिरम् । क्रियतामार्यक क्षिप्रं बुद्धिः कन्यापरिग्रहे ॥ ७ ॥ नागप्रवर आर्यक! यदि आपको भी यह सम्बन्ध भलीभाँति रुचिकर जान पड़े तो शीघ्र ही इनकी पुत्रीको ब्याह लानेका निश्चय कीजिये ॥ ७ ॥ यथा विष्णुकुले लक्ष्मीर्यथा स्वाहा विभावसोः । कुले तव तथैवास्तु गुणकेशी सुमध्यमा ॥ ८ ॥ जैसे भगवान् विष्णुके घरमें लक्ष्मी और अग्निके घरमें स्वाहा शोभा पाती हैं, उसी प्रकार सुन्दरी गुणकेशी तुम्हारे कुलमें प्रतिष्ठित हो ॥ ८ ॥ पौत्रस्यार्थे भवांस्तस्माद् गुणकेशीं प्रतीच्छतु । सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव ॥ ९ ॥ अतः आप अपने पौत्रके लिये गुणकेशीको स्वीकार करें। जैसे इन्द्रके अनुरूप शची हैं, उसी प्रकार आपके सुयोग्य पौत्रके योग्य गुणकेशी है ॥ ९ ॥ पितृहीनमपि ह्येनं गुणतो वरयामहे । बहुमानाच्च भवतस्तथैवैरावतस्य च ॥ १० ॥ सुमुखस्य गुणैश्चैव शीलशौचदमादिभिः । आपके और ऐरावतके प्रति हमारे हृदयमें विशेष सम्मान है और यह सुमुख भी शील, शौच और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये इसके पितृहीन होनेपर भी हम गुणोंके कारण इसका वरण करते हैं ॥ १० १/२ ॥ अभिगम्य स्वयं कन्यामयं दातुं समुद्यतः ॥ ११ ॥ मातलिस्तस्य सम्मानं कर्तुमर्हो भवानपि । ये मातलि स्वयं चलकर कन्यादान करनेको उद्यत हैं। आपको भी इनका सम्मान करना चाहिये ॥ ११ १/२ ॥