भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

अर्जुनको तथा अपनी बहिनके दोनों जुड़वे पुत्रों—नकुल-सहदेवको भी गले लगाया।। (द्रौपदी च सुभद्रा च अभिमन्युश्च भारत। समेत्य च महाबाहुं शल्यं पाण्डुसुतस्तदा।। कृताञ्जलिरदीनात्मा धर्मात्मा शल्यमब्रवीत्। भारत! तदनन्तर द्रौपदी, सुभद्रा तथा अभिमन्युने महाबाहु शल्यके पास आकर उन्हें प्रणाम किया। उस समय उदारचेता धर्मात्मा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने दोनों हाथ जोड़कर शल्यसे कहा। युधिष्ठिर उवाच स्वागतं तेऽस्तु वै राजन्नेतदासनमास्यताम्।। युधिष्ठिर बोले—राजन्! आपका स्वागत है। इस आसनपर विराजिये।

वैशम्पायन उवाच ततो न्यषीदच्छल्यश्च काञ्चने परमासने। कुशलं पाण्डवोऽपृच्छच्छल्यं सर्वसुखावहम्।। स तैः परिवृतः सर्वैः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः।) आसने चोपविष्टस्तु शल्यः पार्थमुवाच ह।। २८ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब राजा शल्य सुवर्णके श्रेष्ठ सिंहासनपर विराजमान हुए। उस समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने सबको सुख देनेवाले शल्यसे कुशलसमाचार पूछा। उन समस्त धर्मात्मा पाण्डवोंसे घिरकर आसनपर बैठे हुए राजा शल्य कुन्तीकुमार युधिष्ठिरसे इस प्रकार बोले—।। २८ ।। कुशलं राजशार्दूल कच्चित् ते कुरुनन्दन। अरण्यवासाद् दिष्ट्यासि विमुक्तो जयतां वर।। २९ ।। ‘नृपतिश्रेष्ठ कुरुनन्दन! तुम कुशलसे तो हो न? विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम वनवासके कष्टसे छुटकारा पा गये।। २९ ।। सुदुष्करं कृतं राजन् निर्जने वसता त्वया। भ्रातृभिः सह राजेन्द्र कृष्णया चानया सह।। ३० ।। ‘राजन्! तुमने अपने भाइयों तथा इस द्रुपदकुमारी कृष्णाके साथ निर्जन वनमें निवास करके अत्यन्त दुष्कर कार्य किया है।। ३० ।। अज्ञातवासं घोरं च वसता दुष्करं कृतम्। दुःखमेव कुतः सौख्यं भ्रष्टराज्यस्य भारत।। ३१ ।। ‘भारत! भयंकर अज्ञातवास करके तो तुमलोगोंने और भी दुष्कर कार्य सम्पन्न किया है। जो अपने राज्यसे वंचित हो गया हो, उसे तो कष्ट ही उठाना पड़ता है, सुख कहाँसे मिल सकता है? ।। ३१ ।। दुःखस्यैतस्य महतो धार्तराष्ट्रकृतस्य वै।