भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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नवाधिकशततमोऽध्यायः

दक्षिणदिशाका वर्णन

सुपर्ण उवाच

इयं विवस्वता पूर्वं श्रौतेन विधिना किल ।
गुरवे दक्षिणा दत्ता दक्षिणेत्युच्यते च दिक् ॥ १ ॥
**गरुड़ कहते हैं—**गालव! यह प्रसिद्ध है कि पूर्वकालमें भगवान् सूर्यने वेदोक्त विधिके अनुसार यज्ञ करके आचार्य कश्यपको दक्षिणारूपसे इस दिशाका दान किया था, इसीलिये इसे दक्षिण दिशा कहते हैं ॥ १ ॥

अत्र लोकत्रयस्यास्य पितृपक्षः प्रतिष्ठितः ।
अत्रोष्मपाणां देवानां निवासः श्रूयते द्विज ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! तीनों लोकोंके पितृगण इसी दिशामें प्रतिष्ठित हैं तथा ‘ऊष्मप’ नामक देवताओंका निवास भी इसी दिशामें सुना जाता है ॥ २ ॥

अत्र विश्वे सदा देवाः पितृभिः सार्धमासते ।
इज्यमानाः स्म लोकेषु सम्प्राप्तास्तुल्यभागताम् ॥ ३ ॥
पितरोंके साथ विश्वेदेवगण सदा दक्षिण दिशामें ही वास करते हैं। वे समस्त लोकोंमें पूजित हो श्राद्धमें पितरोंके समान ही भाग प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥

एतद् द्वितीयं देवस्य द्वारमाचक्षते द्विज ।
त्रुटिशो लवशश्चापि गण्यते कालनिश्चयः ॥ ४ ॥
विप्रवर! विद्वान् पुरुष इस दक्षिण दिशाको धर्म-देवताका दूसरा द्वार कहते हैं। यहीं (चित्रगुप्त आदिके द्वारा) ‘त्रुटि’ और ‘लव’ आदि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म कालांशों-पर दृष्टि रखते हुए प्राणियोंकी आयुकी निश्चित गणना की जाती है ॥ ४ ॥

अत्र देवर्षयो नित्यं पितृलोकर्षयस्तथा ।
तथा राजर्षयः सर्वे निवसन्ति गतव्यथाः ॥ ५ ॥
देवर्षि, पितृलोकके ऋषि तथा समस्त राजर्षिगण दुःखरहित हो सदा इसी दिशामें निवास करते हैं ॥ ५ ॥

अत्र धर्मश्च सत्यं च कर्म चात्र निगद्यते ।
गतिरेषा द्विजश्रेष्ठ कर्मणामवसायिनाम् ॥ ६ ॥
द्विजश्रेष्ठ! इसी दिशामें (रहकर चित्रगुप्त आदिके द्वारा धर्मराजके निकट प्राणियोंके) धर्म, सत्य तथा साधारण कर्मोंके विषयमें कहा जाता है। मृत प्राणी तथा उनके कर्म इसी दिशाका आश्रय लेते हैं ॥ ६ ॥

एषा दिक् सा द्विजश्रेष्ठ यां सर्वः प्रतिपद्यते ।