भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 766, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 766

आचारं प्रतिगृह्णन्त्या सिद्धिः प्राप्तेयमुत्तमा ॥ १४ ॥ 'समस्त अशुभ लक्षणोंसे हीन और अनिन्दित रहकर सदाचारका पालन करते हुए ही मैंने यह उत्तम सिद्धि प्राप्त की है ॥ १४ ॥ आचारः फलते धर्ममाचारः फलते धनम् । आचाराच्छ्रियमाप्नोति आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १५ ॥ 'आचार ही धर्मको सफल बनाता है, आचार ही धनरूपी फल देता है, आचारसे मनुष्यको सम्पत्ति प्राप्त होती है और आचार ही अशुभ लक्षणोंका भी नाश कर देता है ॥ १५ ॥ तदायुष्मन् खगपते यथेष्टं गम्यतामितः । न च ते गर्हणीयाहं गर्हितव्याः स्त्रियः क्वचित् ॥ १६ ॥ 'अतः आयुष्मन् पक्षिराज! अब तुम यहाँसे अपने अभीष्ट स्थानको जाओ। आजसे तुम्हें मेरी निन्दा नहीं करनी चाहिये। मेरी ही क्यों, कहीं किसी भी स्त्रीकी निन्दा करनी उचित नहीं है ॥ १६ ॥ भवितासि यथापूर्वं बलवीर्यसमन्वितः । बभूवतुस्ततस्तस्य पक्षौ द्रविणवत्तरौ ॥ १७ ॥ 'अब तुम पहलेकी ही भाँति बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो जाओगे।' शाण्डिलीके इतना कहते ही गरुड़की पाँखें पहलेसे भी अधिक शक्तिशाली हो गयीं ॥ १७ ॥ अनुज्ञातस्तु शाण्डिल्या यथागतमुपागमत् । नैव चासादयामास तथारूपांस्तुरंगमान् ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् शाण्डिलीकी आज्ञा ले वे जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। वे गालवके बताये अनुसार श्यामकर्ण घोड़े नहीं पा सके ॥ १८ ॥ विश्वामित्रोऽथ तं दृष्ट्वा गालवं चाध्वनि स्थितः । उवाच वदतां श्रेष्ठो वैनतेयस्य संनिधौ ॥ १९ ॥ इधर गालवको राहमें आते देख वक्ताओंमें श्रेष्ठ विश्वामित्रजी खड़े हो गये और गरुड़के समीप उनसे इस प्रकार बोले— ॥ १९ ॥ यस्त्वया स्वयमेवार्थः प्रतिज्ञातो मम द्विज । तस्य कालोऽपवर्गस्य यथा वा मन्यते भवान् ॥ २० ॥ 'ब्रह्मन्! तुमने स्वयं ही जिस धनको देनेकी प्रतिज्ञा की थी, उसे देनेका समय आ गया है। फिर तुम जैसा ठीक समझो, करो ॥ २० ॥ प्रतीक्षिष्याम्यहं कालमेतावन्तं तथा परम् । यथा संसिध्यते विप्र स मार्गस्तु निशाम्यताम् ॥ २१ ॥ मैं इतने ही समयतक और तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा। ब्रह्मन्! जिस प्रकार तुम्हें सफलता मिल सके, उस मार्गका विचार करो' ॥ २१ ॥

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