महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयच्च दुःखं त्वया प्राप्तं द्यूते वै कृष्णया सह । परुषाणि च वाक्यानि सूतपुत्रकृतानि वै ॥ ५० ॥ जटासुरात् परिक्लेशः कीचकाच्च महाद्युते । द्रौपद्याधिगतं सर्वं दमयन्त्या यथाशुभम् ॥ ५१ ॥ सर्वं दुःखमिदं वीर सुखोदर्कं भविष्यति । नात्र मन्युस्त्वया कार्यों विधिर्हि बलवत्तरः ॥ ५२ ॥ महातेजस्वी वीरवर युधिष्ठिर! तुमने द्यूतसभामें द्रौपदीके साथ जो दुःख उठाया है, सूतपुत्र कर्णने तुम्हें जो कठोर बातें सुनायी हैं तथा पूर्वकालमें दमयन्तीने जैसे अशुभ (दुःख) भोगा था, उसी प्रकार द्रौपदीने जटासुर तथा कीचकसे जो महान् क्लेश प्राप्त किया है, यह सभी दुःख भविष्यमें तुम्हारे लिये सुखके रूपमें परिवर्तित हो जायगा। इसके लिये तुम्हें खेद नहीं करना चाहिये; क्योंकि विधाताका विधान अति प्रबल होता है ॥ ५०—५२ ॥
दुःखानि हि महात्मानः प्राप्नुवन्ति युधिष्ठिर । देवैरपि हि दुःखानि प्राप्तानि जगतीपते ॥ ५३ ॥ युधिष्ठिर! महात्मा पुरुष भी समय-समयपर दुःख पाते हैं। पृथ्वीपते! देवताओंने भी बहुत दुःख उठाये हैं ॥
इन्द्रेण श्रूयते राजन् सभार्येण महात्मना । अनुभूतं महत् दुःखं देवराजेन भारत ॥ ५४ ॥ भरतवंशी नरेश! सुना जाता है कि पत्नीसहित महामना देवराज इन्द्रने भी महान् दुःख भोगा है ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सेनोद्योगपर्वणि शल्यवाक्ये अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत सेनोद्योगपर्वमें शल्यवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥