भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 770

अयमुक्तः प्रयच्छेति जानता विभवं लघु ।। १३ ।। एकतः श्यामकर्णानां शुभ्राणां शुद्धजन्मनाम् । अष्टौ शतानि मे देहि हयानां चन्द्रवर्चसाम् ।। १४ ।। गुर्वर्थो दीयतामेष यदि गालव मन्यसे । इत्येवमाह संक्रोधो विश्वामित्रस्तपोधनः ।। १५ ।। ‘इनके बार-बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अतः इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा—‘लाओ, गुरुदक्षिणा दो। गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।' तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी ।। १३—१५ ।।

सोऽयं शोकेन महता तप्यमानो द्विजर्षभः । अशक्तः प्रतिकर्तुं तद् भवन्तं शरणं गतः ।। १६ ।। ‘अतः ये द्विजश्रेष्ठ गालव महान् शोकसे संतप्त हो गुरुदक्षिणा चुकानेमें असमर्थ हो गये हैं और इसीलिये आपकी शरणमें आये हैं ।। १६ ।।

प्रतिगृह्य नरव्याघ्र त्वत्तो भिक्षां गतव्यथः । कृत्वापवर्गं गुरवे चरिष्यति महत् तपः ।। १७ ।। ‘पुरुषसिंह! आपसे भिक्षा ग्रहण करके गुरुको पूर्वोक्त धन देकर ये क्लेशरहित हो महान् तपमें संलग्न हो जायँगे ।। १७ ।।

तपसः संविभागेन भवन्तमपि योक्ष्यते । स्वेन राजर्षितपसा पूर्णं त्वां पूरयिष्यति ।। १८ ।। अपनी तपस्याके एक अंशसे ये आपको भी संयुक्त करेंगे। यद्यपि आप अपनी राजर्षिजनोचित तपस्यासे पूर्ण हैं, तथापि ये अपने ब्राह्म तपसे आपको और भी परिपूर्ण करेंगे ।। १८ ।।

यावन्ति रोमाणि हये भवन्तीह नरेश्वर । तावन्तो वाजिनो लोकान् प्राप्नुवन्ति महीपते ।। १९ ।। ‘नरेश्वर! भूपाल! यहाँ (दान किये हुए) घोड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, दान करनेवाले लोगोंको (परलोकमें) उतने ही घोड़े प्राप्त होते हैं ।। १९ ।।

पात्रं प्रतिग्रहस्यायं दातुं पात्रं तथा भवान् । शङ्खे क्षीरमिवासिक्तं भवत्वेतत् तथोपमम् ।। २० ।। ‘ये गालव दान लेनेके सुयोग्य पात्र हैं और आप दान करनेके श्रेष्ठ अधिकारी हैं। जैसे शंखमें दूध रखा गया हो, उसी प्रकार इनके हाथमें दिए हुए आपके इस दानकी शोभा होगी’ ।। २० ।।