महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 773, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंन च शक्तोऽस्मि ते कर्तुं मोघमागमनं खग । न चाशामस्य विप्रर्षेर्वितथीकर्तुमुत्सहे ॥ ७ ॥ ‘आकाशचारी गरुड़! इस दशामें भी मैं आपके आगमनको निष्फल करनेमें असमर्थ हूँ और इन ब्रह्मर्षिकी आशाको भी मैं विफल करना नहीं चाहता ॥ ७ ॥
तत् तु दास्यामि यत् कार्यमिदं सम्पादयिष्यति । अभिगम्य हताशो हि निवृत्तो दहते कुलम् ॥ ८ ॥ ‘अतः मैं एक ऐसी वस्तु दूँगा, जो इस कार्यका सम्पादन कर देगी। अपने पास आकर कोई याचक हताश हो जाय तो वह लौटनेपर आशा भंग करनेवाले राजाके समूचे कुलको दग्ध कर देता है ॥ ८ ॥
नातः परं वैनतेय किंचित् पापिष्ठमुच्यते । यथाशानाशनाल्लोके देहि नास्तीति वा वचः ॥ ९ ॥ ‘विनतानन्दन! लोकमें कोई ‘दीजिये’ कहकर कुछ माँगे और उससे यह कह दिया जाय कि जाओ मेरे पास नहीं है, इस प्रकार याचककी आशाको भंग करनेसे जितना पाप लगता है, इससे बढ़कर पापकी दूसरी कोई बात नहीं कही जाती ॥ ९ ॥
हताशो ह्यकृतार्थः सन् हतः सम्भावितो नरः । हिनस्ति तस्य पुत्रांश्च पौत्रांश्चाकुर्वतो हितम् ॥ १० ॥ ‘कोई श्रेष्ठ मनुष्य जब कहीं याचना करके हताश एवं असफल होता है, तब वह मरे हुएके समान हो जाता है और अपना हित न करनेवाले धनीके पुत्रों तथा पौत्रोंका नाश कर डालता है ॥ १० ॥
तस्माच्चतुर्णां वंशानां स्थापयित्री सुता मम । इयं सुरसुतप्रख्या सर्वधर्मोपचायिनी ॥ ११ ॥ ‘अतः मेरी जो यह पुत्री है, यह चार कुलोंकी स्थापना करनेवाली है। इसकी कान्ति देवकन्याके समान है। यह सम्पूर्ण धर्मोंकी वृद्धि करनेवाली है ॥ ११ ॥
सदा देवमनुष्याणामसुराणां च गालव । काङ्क्षिता रूपतो बाला सुता मे प्रतिगृह्यताम् ॥ १२ ॥ ‘गालव! इसके रूप-सौन्दर्यसे आकृष्ट होकर देवता, मनुष्य तथा असुर सभी लोग सदा इसे पानेकी अभिलाषा रखते हैं; अतः आप मेरी इस पुत्रीको ही ग्रहण कीजिये ॥ १२ ॥
अस्याः शुल्कं प्रदास्यन्ति नृपा राज्यमपि ध्रुवम् । किं पुनः श्यामकर्णानां हयानां द्वे चतुःशते ॥ १३ ॥ ‘इसके शुल्कके रूपमें राजालोग निश्चय ही अपना राज्य भी आपको दे देंगे; फिर आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १३ ॥
स भवान् प्रतिगृह्णातु ममैतां माधवीं सुताम् । अहं दौहित्रवान् स्यां वै वर एष मम प्रभो ॥ १४ ॥