भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

‘धर्मात्मन्! जो राजा पराये धनका अपनी इच्छाके अनुसार दान करता है, उसे धर्म और यशकी प्राप्ति नहीं होती है ।। १४ ।। सोऽहं प्रतिग्रहीष्यामि ददात्वेतां भवान् मम । कुमारीं देवगर्भाभामेकपुत्रभवाय मे ।। १५ ।। ‘अतः आप देवकन्याके समान सुन्दरी इस राजकुमारीको केवल एक पुत्र उत्पन्न करनेके लिये मुझे दें। मैं इसे ग्रहण करूँगा’ ।। १५ ।। तथा तु बहुधा कन्यामुक्तवन्तं नराधिपम् । उशीनरं द्विजश्रेष्ठो गालवः प्रत्यपूजयत् ।। १६ ।। इस प्रकार भाँति-भाँतिकी न्याययुक्त बातें कहनेवाले राजा उशीनरकी विप्रवर गालवने भूरि-भूरि प्रशंसा की ।। १६ ।। उशीनरं प्रतिग्राह्य गालवः प्रययौ वनम् । रेमे स तां समासाद्य कृतपुण्य इव श्रियम् ।। १७ ।। उशीनरको वह कन्या सौंपकर गालव मुनि वनको चले गये। जैसे पुण्यात्मा पुरुष राज्यलक्ष्मीको प्राप्त करे, उसी प्रकार उस राजकन्याको पाकर राजा उशीनर उसके साथ रमण करने लगे ।। १७ ।। कन्दरेषु च शैलानां नदीनां निर्झरेषु च । उद्यानेषु विचित्रेषु वनेषूपवनेषु च ।। १८ ।। हर्म्येषु रमणीयेषु प्रासादशिखरेषु च । वातायनविमानेषु तथा गर्भगृहेषु च ।। १९ ।। उन्होंने पर्वतोंकी कन्दराओंमें, नदियोंके सुरम्य तटोंपर, झरनोंके आस-पास, विचित्र उद्यानोंमें, वनों और उपवनोंमें, रमणीय अट्टालिकाओंमें, प्रासादशिखरोंपर, वायु-के मार्गसे उड़नेवाले विमानोंपर तथा पृथ्वीके भीतर बने हुए गर्भगृहोंमें माधवीके साथ विहार किया ।। ततोऽस्य समये जज्ञे पुत्रो बालरविप्रभः । शिबिर्नाम्नाभिविख्यातो यः स पार्थिवसत्तमः ।। २० ।। तदनन्तर यथासमय उसके गर्भसे राजाको एक पुत्र प्राप्त हुआ, जो बालसूर्यके समान तेजस्वी था। वही बड़ा होनेपर नृपश्रेष्ठ महाराज शिबिके नामसे विख्यात हुआ ।। २० ।। उपस्थाय स तं विप्रो गालवः प्रतिगृह्य च । कन्यां प्रयातस्तां राजन् दृष्टवान् विनतात्मजम् ।। २१ ।। राजन्! तत्पश्चात् विप्रवर गालव राजाके दरबारमें उपस्थित हुए और उस कन्याको वापस लेकर वहाँसे चल दिये। मार्गमें उन्हें विनतानन्दन गरुड़ दिखायी दिये ।। २१ ।।

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११८ ।।