महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 793, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त कई हजार वर्षोंका समय व्यतीत हो गया। ययातिका चित्त अपना स्वर्गीय वैभव देखकर स्वयं ही आश्चर्यचकित हो उठा। उनकी बुद्धिपर मोह छा गया और वे महान् समृद्धिशाली महत्तम राजर्षियोंके अपने समीप बैठे होनेपर भी सम्पूर्ण देवताओं, मनुष्यों तथा महर्षियोंकी भी अवहेलना करने लगे ।। १५-१६ ।। ततस्तं बुबुधे देवः शक्रो बलनिषूदनः । ते च राजर्षयः सर्वे धिग्धिगित्येवमब्रुवन् ।। १७ ।। तदनन्तर बलसूदन इन्द्रदेवको ययातिकी इस अवस्थाका पता लग गया। वे सम्पूर्ण राजर्षिगण भी उस समय ययातिको धिक्कारने लगे ।। १७ ।। विचारश्च समुत्पन्नो निरीक्ष्य नहुषात्मजम् । को न्वयं कस्य वा राज्ञः कथं वा स्वर्गमागतः ।। १८ ।। नहुषपुत्र ययातिको देखकर स्वर्गवासियोंमें यह विचार खड़ा हो गया—'यह कौन है? किस राजाका पुत्र है? और कैसे स्वर्गमें आ गया है? ।। १८ ।। कर्मणा केन सिद्धोऽयं क्व वानेन तपश्चितम् । कथं वा ज्ञायते स्वर्गे केन वा ज्ञायतेऽप्युत ।। १९ ।। 'इसे किस कर्मसे सिद्धि प्राप्त हुई है? इसने कहाँ तपस्या की है? स्वर्गमें किस प्रकार इसे जाना जाय अथवा कौन यहाँ इसको जानता है?' ।। १९ ।। एवं विचारयन्तस्ते राजानं स्वर्गवासिनः । दृष्ट्वा पप्रच्छुरन्योन्यं ययातिं नृपतिं प्रति ।। २० ।। इस प्रकार विचार करते हुए स्वर्गवासी ययातिके विषयमें एक-दूसरेकी ओर देखकर प्रश्न करने लगे ।। २० ।। विमानपालाः शतशः स्वर्गद्वाराभिरक्षिणः । पृष्टा आसनपालाश्च न जानीमेत्यथाब्रुवन् ।। २१ ।। सैकड़ों विमानरक्षकों, स्वर्गके द्वारपालों तथा सिंहासनके रक्षकोंसे पूछा गया; किंतु सबने यही उत्तर दिया—'हम इन्हें नहीं जानते' ।। २१ ।। सर्वे ते ह्यावृतज्ञाना नाभ्यजानन्त तं नृपम् । स मुहूर्तादथ नृपो हतौजाश्चाभवत् तदा ।। २२ ।। उन सबके ज्ञानपर पर्दा पड़ गया था; अतः वे उन राजाको नहीं पहचान सके। फिर तो दो ही घड़ीमें राजा ययातिका तेज नष्ट हो गया ।। २२ ।।
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते ययातिमोहे विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२० ।।