महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 798, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाधवीं प्रेक्ष्य राजानस्तेऽभिवाद्येदमब्रुवन् ।। २० ।। किमागमनकृत्यं ते किं कुर्मः शासनं तव । आज्ञाप्या हि वयं सर्वे तव पुत्रास्तपोधने ।। २१ ।।
नारदजी कहते हैं— इसी समय उन राजाओंने अपनी माता माधवीको देखा, जो मृगोंकी भाँति उन्हींके साथ विचरती हुई क्रमशः वहाँ आ पहुँची थी। उसे प्रणाम करके राजाओंने इस प्रकार पूछा—'तपोधने! यहाँ आपके पधारनेका क्या प्रयोजन है? हम आपकी किस आज्ञाका पालन करें? हम सभी आपके पुत्र हैं; अतः हमें आप योग्य सेवाके लिये आज्ञा प्रदान करें' ।।
तेषां तद् भाषितं श्रुत्वा माधवी परया मुदा । पितरं समुपागच्छद् ययातिं सा ववन्द च ।। २२ ।। उनकी ये बातें सुनकर माधवीको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह अपने पिता ययातिके पास गयी और उसने उन्हें प्रणाम किया ।। २२ ।।
स्पृष्ट्वा मूर्धनि तान् पुत्रांस्तापसी वाक्यमब्रवीत् । दौहित्रास्तव राजेन्द्र मम पुत्रा न ते पराः ।। २३ ।। तदनन्तर तपस्विनी माधवीने उन पुत्रोंके सिरपर हाथ रखकर अपने पितासे कहा—'राजेन्द्र! ये सभी आपके दौहित्र (नाती) और मेरे पुत्र हैं, पराये नहीं हैं ।।
इमे त्वां तारयिष्यन्ति दृष्टमेतत् पुरातने । अहं ते दुहिता राजन् माधवी मृगचारिणी ।। २४ ।। 'ये आपको तार देंगे। दौहित्रोंके द्वारा मातामह (नाना)-का यह उद्धार पुरातन वेदशास्त्रमें स्पष्ट देखा गया है। राजन्! मैं आपकी पुत्री माधवी हूँ और इस तपोवनमें मृगोंके समान जीवनचर्या बनाकर विचरती हूँ ।।
मयाप्युपचितो धर्मस्ततोऽर्धं प्रतिगृह्यताम् । यस्माद् राजन् नराः सर्वे अपत्यफलभागिनः ।। २५ ।। तस्मादिच्छन्ति दौहित्रान् यथा त्वं वसुधाधिप । 'पृथ्वीनाथ! मैंने भी महान् धर्मका संचय किया है। उसका आधा भाग आप ग्रहण करें। राजन्! सब मनुष्य अपनी संतानोंके किये हुए सत्कर्मोंके फलके भागी होते हैं। इसीलिये वे दौहित्रोंकी इच्छा करते हैं, जैसे आपने की थी' ।। २५ १/२ ।।
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे शिरसा जननीं तदा ।। २६ ।। अभिवाद्य नमस्कृत्य मातामहमथाब्रुवन् । उच्चैरनुपमैः स्निग्धैः स्वरैरापूर्य मेदिनीम् ।। २७ ।। मातामहं नृपतयस्तारयन्तो दिवश्च्युतम् ।