भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 801

वीरशब्दफलं चैव तेन संयुज्यतां भवान् ॥ ७ ॥ तदनन्तर क्षत्रियशिरोमणि प्रतर्दनने यह बात कही—'मैं जिस प्रकार सदा धर्ममें तत्पर रहा हूँ, सर्वदा न्याययुक्त युद्धमें संलग्न होता आया हूँ तथा संसारमें मैंने जो क्षत्रियवंशके अनुरूप यश एवं वीर शब्दके योग्य पुण्यफलका अर्जन किया है, उससे आप संयुक्त हों' ॥

शिबिरौशीनरो धीमानुवाच मधुरां गिरम् । यथा बालेषु नारीषु वैहार्येषु तथैव च ॥ ८ ॥ संगरेषु निपातेषु तथा तद्व्यसनेषु च । अनृतं नोक्तपूर्वं मे तेन सत्येन खं व्रज ॥ ९ ॥ यथा प्राणांश्च राज्यं च राजन् कामसुखानि च । त्यजेयं न पुनः सत्यं तेन सत्येन खं व्रज ॥ १० ॥ यथा सत्येन मे धर्मो यथा सत्येन पावकः । प्रीतः शतक्रतुश्चैव तेन सत्येन खं व्रज ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् उशीनरपुत्र बुद्धिमान् शिबिने मधुर वाणीमें कहा—'मैंने बालकोंमें, स्त्रियोंमें, हास-परिहासके योग्य सम्बन्धियोंमें, युद्धमें, आपत्तियोंमें तथा संकटोंमें भी पहले कभी असत्यभाषण नहीं किया है। उस सत्यके प्रभावसे आप स्वर्गलोकमें जाइये। राजन्! मैं अपने प्राण, राज्य एवं मनोवांछित सुखभोगको भी त्याग सकता हूँ, परंतु सत्यको नहीं छोड़ सकता। उस सत्यके प्रभावसे आप स्वर्गलोकमें जाइये। यदि मेरे सत्यसे धर्मदेव संतुष्ट हैं, यदि मेरे सत्यसे अग्निदेव प्रसन्न हैं तथा यदि मेरे सत्यभाषणसे देवराज इन्द्र भी तृप्त हुए हैं तो उस सत्यके प्रभावसे आप स्वर्गलोक-में जाइये' ॥

अष्टकस्त्वथ राजर्षिः कौशिको माधवीसुतः । अनेकशतयज्वानं नाहुषं प्राप्य धर्मवित् ॥ १२ ॥ इसके बाद माधवीके छोटे पुत्र कुशिकवंशी धर्मज्ञ राजर्षि अष्टकने कई सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले नहुषनन्दन ययातिके पास जाकर कहा— ॥ १२ ॥

शतशः पुण्डरीका मे गोसवाश्चरिताः प्रभो । क्रतवो वाजपेयाश्च तेषां फलमवाप्नुहि ॥ १३ ॥ न मे रत्नानि न धनं न तथान्ये परिच्छदाः । ऋतुष्वनुपयुक्तानि तेन सत्येन खं व्रज ॥ १४ ॥ 'प्रभो! मैंने सैकड़ों पुण्डरीक, गोसव तथा वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। आप उन सबका फल प्राप्त करें। मेरे पास कोई भी रत्न, धन अथवा अन्य सामग्री ऐसी नहीं है, जिसका मैंने यज्ञोंमें उपयोग न किया हो। इस सत्य कर्मके प्रभावसे आप स्वर्गलोकमें जाइये' ॥ १३-१४ ॥

यथा यथा हि जल्पन्ति दौहित्रास्तं नराधिपम् । तथा तथा वसुमतीं त्यक्त्वा राजा दिवं ययौ ॥ १५ ॥