महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतास्तु यत्नं परं कृत्वा पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ १७ ॥ कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् । न स शक्यः सुदुर्धर्षो धैर्याच्चालयितुं प्रभो ॥ १८ ॥ यत् ते कार्यं महाभाग क्रियतां तदनन्तरम् । वे सब अप्सराएँ (त्रिशिराको विचलित करनेका) पूरा प्रयत्न करके पुनः देवराज इन्द्रकी सेवामें उपस्थित हुईं और हाथ जोड़कर बोलीं—'प्रभो! वे त्रिशिरा बड़े दुर्धर्ष तपस्वी हैं, उन्हें धैर्यसे विचलित नहीं किया जा सकता। महाभाग! अब आपको जो कुछ करना हो, उसे कीजिये' ॥ १७-१८ १/२ ॥
सम्पूज्याप्सरसः शक्रो विसृज्य च महामतिः ॥ १९ ॥ चिन्तयामास तस्यैव वधोपायं युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! तब परम बुद्धिमान् इन्द्रने अप्सराओंका आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया और वे त्रिशिराके वधका उपाय सोचने लगे ॥ १९ १/२ ॥
स तूष्णीं चिन्तयन् वीरो देवराजः प्रतापवान् ॥ २० ॥ विनिश्चितमतिर्धीमान् वधे त्रिशिरसोऽभवत् ।