महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 812, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रुत्वा यः सुहृदां शास्त्रं मर्त्यो न प्रतिपद्यते । विपाकान्ते दहत्येनं किम्पाकमिव भक्षितम् ॥ २२ ॥ 'जो मनुष्य सुहृदोंके मुखसे शास्त्रसम्मत उपदेश सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं करता है, उसका यह अस्वीकार उसे परिणाममें उसी प्रकार शोकदग्ध करता है, जैसे खाया हुआ इन्द्रायण फल पाचनके अन्तमें दाह उत्पन्न करनेवाला होता है ॥ २२ ॥
यस्तु निःश्रेयसं वाक्यं मोहान्न प्रतिपद्यते । स दीर्घसूत्रो हीनार्थः पश्चात्तापेन युज्यते ॥ २३ ॥ 'जो मोहवश अपने हितकी बात नहीं मानता है, वह दीर्घसूत्री मनुष्य अपने स्वार्थसे भ्रष्ट होकर केवल पश्चात्तापका भागी होता है ॥ २३ ॥
यस्तु निःश्रेयसं श्रुत्वा प्राक् तदेवाभिपद्यते । आत्मनो मतमुत्सृज्य स लोके सुखमेधते ॥ २४ ॥ 'जो मानव अपने कल्याणकी बात सुनकर अपने मतका आग्रह छोड़कर पहले उसीको ग्रहण करता है, वह संसारमें सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है ॥ २४ ॥
योऽर्थकामस्य वचनं प्रातिकूल्यान्न मृष्यते । शृणोति प्रतिकूलानि द्विषतां वशमेति सः ॥ २५ ॥ 'जो अपनी ही भलाई चाहनेवाले अपने सुहृदके वचनोंको मनके प्रतिकूल होनेके कारण नहीं सहन करता है और उन असुहृदोंके प्रतिकूल कहे हुए वचनोंको ही सुनता है, वह शत्रुओंके अधीन हो जाता है ॥ २५ ॥
सतां मतमतिक्रम्य योऽसतां वर्तते मते । शोचन्ते व्यसने तस्य सुहृदो नचिरादिव ॥ २६ ॥ 'जो मनुष्य सत्पुरुषोंकी सम्मतिका उल्लंघन करके दुष्टोंके मतके अनुसार चलता है, उसके सुहृद् उसे शीघ्र ही विपत्तिमें पड़ा देख शोकके भागी होते हैं ॥
मुख्यानमात्यानुत्सृज्य योनिहीनान् निषेवते । स घोरामापदं प्राप्य नोत्तारमधिगच्छति ॥ २७ ॥ 'जो अपने मुख्य मन्त्रियोंको छोड़कर नीच प्रकृतिके लोगोंका सेवन करता है, वह भयंकर विपत्तिमें फँसकर अपने उद्धारका कोई मार्ग नहीं देख पाता है ॥ २७ ॥
योऽसत्सेवी वृथाचारो न श्रोता सुहृदां सताम् । परान् वृणीते स्वान् द्वेष्टि तं गौस्त्यजति भारत ॥ २८ ॥ 'भारत! जो दुष्ट पुरुषोंका संग करनेवाला और मिथ्याचारी होकर अपने श्रेष्ठ सुहृदोंकी बात नहीं सुनता है, दूसरोंको अपनाता और आत्मीयजनोंसे द्वेष रखता है, उसे यह पृथ्वी त्याग देती है ॥ २८ ॥
स त्वं विरुध्य तैर्वीरैरन्येभ्यस्त्राणमिच्छसि । अशिष्टेभ्योऽसमर्थेभ्यो मूढेभ्यो भरतर्षभ ॥ २९ ॥