महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 823, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंनकुलः सहदेवश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ७ ॥ विराटश्च शिखण्डी च शैशुपालिश्च दंशिताः । यावन्न प्रविशन्त्येते नक्रा इव महार्णवम् ॥ ८ ॥ कृतास्त्राः क्षिप्रमस्यन्तस्तावच्छाम्यतु वैशसम् । ‘नकुल, सहदेव, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, विराट, शिखण्डी तथा शिशुपालपुत्र धृष्टकेतु—ये अस्त्रविद्यामें निपुण महान् वीर कवच धारण करके महासागरमें घुसे हुए ग्राहोंकी भाँति तुम्हारी सेनाके भीतर जबतक प्रवेश नहीं करते हैं, तभीतक यह जनसंहारका संकल्प शान्त हो जाना चाहिये ।। ७-८ ½ ।।
यावन्न सुकुमारेषु शरीरेषु महीक्षिताम् ॥ ९ ॥ गार्ध्रपत्राः पतन्त्युग्रास्तावच्छाम्यतु वैशसम् । ‘जबतक इन भूमिपालोंके सुकुमार शरीरोंपर गीधकी पाँखोंसे युक्त भयंकर बाण नहीं गिर रहे हैं, तभीतक युद्धका संकल्प शान्त हो जाय ।। ९ ½ ।।
चन्दनागुरुदिग्धेषु हारनिष्कधरेषु च । नोरःसु यावद् योधानां महेष्वासैर्महेषवः ॥ १० ॥ कृतास्त्रैः क्षिप्रमस्यद्भिर्दूरपातिभिरायसाः । अभिलक्ष्यैर्निपात्यन्ते तावच्छाम्यतु वैशसम् ॥ ११ ॥ ‘सामने आते ही लक्ष्यको मार गिरानेवाले, शीघ्रतापूर्वक बाण चलाने और दूरतकका लक्ष्य बींधनेवाले, अस्त्रविद्याके पारंगत महाधनुर्धर विपक्षी वीर जबतक तुम्हारे योद्धाओंके चन्दन और अगुरुसे चर्चित तथा हार और निष्क धारण करनेवाले वक्षःस्थलोंपर विशाल बाणोंकी वर्षा नहीं करते, तभीतक तुम्हें युद्धका विचार त्याग देना चाहिये ।। १०-११ ।।
अभिवादयमानं त्वां शिरसा राजकुञ्जरः । पाणिभ्यां प्रतिगृह्णातु धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १२ ॥ ‘हम चाहते हैं कि नृपश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर तुम्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करते देख दोनों हाथोंसे पकड़ (कर हृदयसे लगा) लें ।। १२ ।।
ध्वजाङ्कुशपताकाङ्कं दक्षिणं ते सुदक्षिणः । स्कन्धे निक्षिपतां बाहुं शान्तये भरतर्षभ ॥ १३ ॥ ‘भरतश्रेष्ठ! उत्तम दक्षिणा देनेवाले युधिष्ठिर ध्वजा, अंकुश और पताकाओंके चिह्नसे सुशोभित अपनी दाहिनी भुजाको जगत्में शान्ति स्थापित करनेके लिये तुम्हारे कंधेपर रखें ।। १३ ।।
रत्नौषधिसमेतेन रक्ताङ्गुलितलेन च । उपविष्टस्य पृष्ठं ते पाणिना परिमार्जतु ॥ १४ ॥ ‘तथा तुम्हें पास बिठाकर रत्न एवं ओषधियोंसे युक्त लाल हथेलीवाले हाथसे तुम्हारी पीठको धीरे-धीरे सहलायें ।।